मीठा खाने के शौकीन थे ब्रह्मलीन स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि महाराज

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जगद्गुरु शंकराचार्य और पद्मभूषण पूज्य गुरुदेव स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि महाराज का मंगलवार सुबह ब्रह्मलीन हो गए। वे लंबेस समय से बीमार चल रहे थे और देहरादून के एक अस्पताल में उनका उपचार चल रहा था। बुधवार को शाम 4 बजे भारत माता जनहित ट्रस्ट के राघव कुटीर के आंगन में समाधि दी जाएगी। निवृत्त शंकराचार्य पद्मभूषण महामंडलेश्वर स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि का जन्म 19 सितंबर, 1932 को आगरा में हुआ था।

हालांकि उनका परिवार मूलतः सीतापुर (उप्र) का रहने वाला था। संन्यास से पहले वे अंबिका प्रसाद पांडेय के नाम से जाने जाते थे। उनके पिता शिवशंकर पांडेय ने उन्हें बचपन से ही अध्ययनशीलता, चिंतन और सेवा का का पाठ पढ़ाया था और उन्हें सदैव अपने लक्ष्य के प्रति सजग और सक्रिय रहने की प्रेरणा दी। वे स्कूल से लेकर काॅलेज तक की पढ़ाई में हमेशा अग्रणी रहे। इतना ही नहीं, लोगों की सेवा करते हुए उनके मन में सन्यासी बनने का विचार आया।

इसी बीच सत्यमित्रानन्द गिरि की मुलाकात स्वामी वेदव्यासानंद महाराज से हुई और वे ही उनके गुरु बन गए। पांच साल बाद 27 वर्ष की आयु में वे शंकराचार्य बन गए, जो देश में सबसे कम उम्र के पहले शंकराचार्य थे। शंकराचार्य का पद निर्वाहन करने के बाद उन्होंने पद त्याग कर आदिवासियों की सेवा में जुट गए। स्वामी सत्यमित्रानंदजी को सूती कपड़े का अचला और कौपिन पहनना बहुत पसंद था। हालांकि वह ऊपर एक नारंगी रंग का चद्दर ओढ़कर रखते हंै। सादा भोजन करने वाले जगद्गुरू शंकराचार्य को मीठा बहुत पसंद था।

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मीठे में भी मोदक उनका सबसे लोकप्रिय व्यंजन था। बताया जाता है कि वह नियमानुसार दिन में तीन बार मोदक का सेवन करते थे। वे कहते थे कि मोदक खाने से मुंह से हमेशा मीठे शब्द निकलते हैं। बताया जाता है कि गुरु और शिष्य में बहुत ही मधुर संबंध थे। सत्यमित्रानन्द गिरि बताते थे कि उनके गुरुजी कभी चाय नहीं पीते थे और कभी चाय पीने का मौका आ भी गया तो उन्हें बहुत तेज पसीना आ जाता था। सूती कपड़े पहनने के शौकीन स्वामी सत्यमित्रानंदगिरि महाराज हर साल गुरु पूर्णिमा के दिन अपने भक्तों को 400 मीटर सूती कपड़ा बांटता थे। देश-विदेश से भक्त प्रवचन सुनने आते हैं।

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