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पर्यावरण शिक्षा पर सुप्रीम कोर्ट की बात कब मानेगी सरकार,वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर की टिप्पणी

Posted on: 08 May 2018 06:13 by Ravindra Singh Rana
पर्यावरण शिक्षा पर सुप्रीम कोर्ट की बात कब मानेगी सरकार,वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर की टिप्पणी

देश में बढ़ते प्रदूषण और बिगड़ते पर्यावरण संतुलन की डरावनी खबरों के बीच सुप्रीम कोर्ट का एक निदेश बार -बार याद आता है। वह निदेश 22 नवंबर, 1991 का है। एम.सी.मेहता की जनहित याचिका पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने उस दिन यह निदेश दिया था कि प्राथमिक से लेकर विश्व विद्यालय स्तर तक पर्यावरण विज्ञान की पढ़ाई पृथक और अनिवार्य विषय के रूप में शुरू कराई जाए।पर इस निदेश का पालन आंशिक रूप से ही हो सका है।

इस निदेश की मंशा यह थी कि कम से कम इससे नयी पीढि़यां तो पर्यावरण को लेकर जागरूक होंगी।मौजूदा और पिछली पीढि़यों ने तो पर्यावरण संतुलन को बिगाड़ने के लिए जो कुछ किए हैं,उसके कुपरिणाम तो हम भुगत ही रहे हैं।अभी और भुगतेंगे।

पर 1991 के बाद संभवतः इस देश की किसी भी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक निर्णय-निदेश को अक्षरशः लागू नहीं होने दिया।किसी ने आरोप लगाया था कि इसके पीछे ‘भूगोल लाॅबी’ सक्रिय रही है। जहां- तहां लागूू हुआ भी तो वह रस्म अदायगी के लिए ही।

गत साल मार्च में भी केंद्र सरकार के वकील ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि देश के 306 विश्व विद्यालयों ने अब तक सुप्रीम कोर्ट के निदेश का पालन नहीं किया है।प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा तो राज्य सरकारों के हाथों में है।

याद रहे कि कुछ सरकारों व शिक्षण संस्थानों ने पर्यावरण विषय को किसी अन्य विषय के साथ मिलाकर अपने कत्र्तव्यों की इतिश्री कर ली है।हालांकि सुप्रीम कोर्ट का निदेश पृथक व अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाने के लिए है।
जहां भी पर्यावरण विज्ञान की अलग से पढ़ाई होती है ,वहां के छात्रों की इस मामले में जागरूकता देखते ही बनती है।

वैसे छात्र अपने घरों में भी भरसक वैसा माहौल बनाते हैं।
कल यह खबर आई कि विश्व के टाॅप 10 प्रदूषित शहरों में पटना सहित बिहार के तीन शहर शामिल हैं ।स्वाभाविक ही है कि उस पर राज्य के नगर विकास मंत्री सुरेश शर्मा ने कहा कि इस मामले में पब्लिक को भी सचेत होना चाहिए।

पर सचेत होने के पहले उसे समस्या को लेकर जागरूक भी तो होना होगा।यदि छात्र-छात्राओं को इस विषय को अनिवार्य व पृथक विषय के रूप में पढ़ाया जाए तो उन विद्यार्थियों के परिजनों को भी जागरूक करने में मदद मिलेगी। आज की पीढ़ी तो कम ही जागरूक है।यदि शैक्षणिक संस्थाओं में पर्यावरण की पढ़ाई होगी तो अगली पीढि़यां भी सचेत होंगी और जागरूक भी।

 सुरेंद्र किशोर 

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