सुपर 30 : बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय

0
58

लेखक-निर्देशक : विकास बहल
पटकथा : फरहाद सामजी
अदाकार : ऋतिक रोशन, मृनाल ठाकुर, पंकज त्रिपाठी, नन्दिश संधू, आदित्य श्रीवास्तव, वीरेंद्र सक्सेना
संगीत : अतुल अजय, जिलियस पैकीयम

फिल्म से पहले लघु चर्चा –

दोस्तो स्कूल समय में गणित एक ऐसा विषय था जिसका नाम आते ही जिस्म के अनेक हिस्सो से पसीना आने लगता था और फिल्म बिहार के पटना के एक गणित के शिक्षक आनंद कुमार पर आधारित है या थी जिसे बदल कर प्रेरित घोषणा किया गया।

दोस्तो शिक्षा की बात भारतीय परिप्रेक्ष्य में हो और बेबिगटन मैकाले का जिक्र न हो तो अधूरा लगेगा क्योकि हमारी गुलामी की सही व्यख्या और फायदा इसी ब्रिटिश साम्राज्य का नौकर जिसे भारतीय शिक्षा पद्धति बनाने के लिए भेजा गया था तो उसका उद्देश्य भारत मे अंग्रेजो के गुलाम और क्लर्क तैयार करना था। तो इसी उद्देश्य को लेकर मैकाले ने शिक्षा नीति बनाई और लागू की थी सन 1850 में देश मे 7 लाख 30 हजार गुरुकुल थे जिसमें 18 विषय पर अध्ययन होता था, जिस शिक्षा नीति पर राजीव गांधी सरकार ने रद्दोबदल की कोशिश की थी।

वर्तमान में भी आनन्द कुमार एक शिक्षक है जो आईआईटी के लिए उन छात्रों को तैयार करते है जो निर्धन, मिस्कीन, साधन विहीन होते हैं, जिसमे वह 30 छात्रों को प्रतिवर्ष चुनते है और आईआईटी में चयन करवाने के लिए उन्हें तैयार करते हैं। यह जज्बा निसन्देह मुझे क्या पूरे देश पर एहसान महसूस होने लगा है, देश के संसाधनों, नौकरियो पर जितना हक पूंजीपतियों के है उतना ही हक गरीब मिस्कीन का भी है। यही जज्बा दिल को छू गया आनन्द कुमार का, जहां सफलता वहां विवाद भी होते ही है पर हम आनन्द कुमार के जीवन के विवादों को दरकिनार करते है और उपलब्धियों पर चर्चा करते है।

देश मे बॉयोग्राफी की बाढ़ आ रही है, भाग मिल्खा भाग, सचिन, धोनी, केसरी, पेड़मेंन, अजहर, संजू, राजी, लम्बी फेहरिस्त हो सकती है, पर आनन्द कुमार एक शिक्षक जो कि सामान्य वर्ग से होकर सामान्य छात्रों को असामान्य बनाने की कवायद ही इस उनवान (विषय) को खास बनाती है।

अब फिल्म पर चर्चा-

कहानी-

गुरू गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाय, बलिहारी गुरु अपने गोविंद दियो बताय

गुरू का दर्जा इस देश मे भगवान से भी बुलन्द माना गया है, और यह कहानी गुरू पर आधारित है। कहानी बिल्कुल आसान है कि एक साधनविहीन आनन्द कुमार जो कि गणित के शिक्षक होते है उनकी यात्रा कैसी-कैसी बाधाओं से गुजरी और कैसे आनन्द ने निर्धन छात्रों को उनके मुकाम तक पहुचाया है।

संगीत

अच्छा बना है गाने लगभग सभी परिस्तिथि जन्य (सिचुएशनल) रखे गए है जो कि भारतीय सिनेमा में लंबे समय बाद देखने को मिले है, गाना जोग्राफिया, पैसाये पैसा, बसन्ती नो डांस अच्छे बन पड़े है, बसन्ती नो डांस में तो अमिताभ भट्टाचार्य ने अंग्रेजी और भोजपुरी का गजब का तालमेल डाल दिया हैं। सुनने में कर्णप्रिय लगे, लेकिन कुछ जगह पर जूलियस पैकीयम का बेक ग्राउंड हॉरर दृश्यों का अनुभव देता है।

फिल्म पूरे शिक्षा पद्धति पर प्रहार करती है शिक्षा मंत्री बोलते दिखे कि शिक्षा के नाम पर सरकार से जमीन लेंगे, बिल्डिंग नीचले हिस्से शिक्षा व्यवस्था उसके ऊपर बार उसके ऊपर शहर का सबसे बड़ा बैंक्वेट (शादी) हॉल बनेगा। यह संवाद बदहाल शिक्षा व्यवस्था की गाथा सुना गया है।

निर्देशक विकास बहल ने क्वीन, चिल्लर पार्टी पहले बना चुके है लेकिन इस फिल्म में उन्होंने हर आयाम को सफलता ने निभाया हैं। फिल्म को चटपटा बनाने के लफड़े में उन्होंने सिनिमाई आजादी (सिनेमेटिक लिबर्टी) का का ज्यादा फायदा उठा लिया। जिससे फिल्म देखते वक्त मन मे सवाल बनने लगते है तो हमारे देश मे फिल्मो में यह चलन बेहद आम भी है। उदाहरण दंगल, पेड़मेंन, केसरी, एयरलिफ्ट, पद्मावत लगभग सभी मे यही आजादी का भरपूर फायदा लिया गया भी था। लेकिन इस फिल्म में आपका ध्यान उधर नही जा पाएगा। फिल्म इतनी कसी हुई है कि 154 मिंट कब पार हो गए पता ही नही पड़ता।

अदाकारी

ऋतिक ने सात्विक अभिनय (मेथड एक्टिंग) शानदार आँगीकृत किया है। वैसे भी कृष की असल जरूरत देश के छात्रों को पढ़ाई में ही है, तो ग्रीक गॉड की इमेज को तोड़ते हुवे ऋतिक ने बड़ी ईमानदारी, लगन, शिद्दत से आनन्द कुमार की आम जिन्दगी को पेश किया है, यह काबिले तारीफ है। बस कहीं-कहीं वह भोजपुरी भाषाई (एक्सेंट) परोसने पर पकड़ नही बना पाए लेकिन यह गलती नजर अंदाज की जा सकती है। ऋतिक ने भावनात्मक दृश्यों में जान फूंक दी है जो कि आपको ऋतिक के अभिनय क्षमताओं से रूबरू कराते हैं। पंकज त्रिपाठी जिस फेक्ट्री से अभिनय के गुर लेकर बाहर आए है वह उनकी हर किरदार की प्रस्तुतिकरण में झलकता है, आदित्य श्रीवास्तव मंजे हुए अभिनेता सहज अभिनेता है, वीरेंद्र सक्सेना कम काम पर शानदार लगे है, मृणाल ठाकुर पिछली फिल्म लव सोनिया में दिखी थी स्वभाविक लगी है, मुकेश छाबड़ा की कास्टिंग ऐसी लगी मानो किसी माला में मोती पिरो दिए गये है।

मर्मस्पर्शी पल

ऋतिक उनके पापा, भाई तीनो एक सायकल पर जाते है दृश्य दिल मे घर जाता है, आनन्द कुमार चोरी छिापे एक वाचनालय में पढ़ रहे होते हैं। उन्हें धक्के मार कर बाहर निकालना फिर उसी पुस्तक में आनन्द का शोध छपना फिर आनन्द का उस वाचनालय के चपरासी के पैर छुना, अंतिम दृश्य में छात्रों की सफलता पर भवनात्मक दृश्य में ऋतिक ने जान डाल दी है।

एक और दृश्य जिसमे सभी सुपर 30 छात्र मिलते है ऋतिक से, उस पर बेकग्राउंड विद्या विद्या सरस्वती का गूंजना भी दिल को छू जाता है, आनन्द कुमार का एक छात्र अमेरिका में सफलता के झंडे गाड़ कर आनन्द कुमार की कहानी बयां करता है।

पटकथा

लाजवाब है कई संवाद आपको सालों तक याद रहेंगे, जिसे फरहाद ने बड़ी ईमानदारी से लिखा है, एक संवाद ‘की ये अमीर लोग खुद के लिए चिकनी सड़के बनाए और हमरे लिए राहों में बड़े-बड़े गड्ढे खोद दिए पर हमें छलांग लगाना सीखा दिए एक दिन सबसे बड़ी छलांग हम ही लगाएगे‘ ये संवाद नकारात्मकता में भी सकारत्मकता खोज लेने वाली बात है जो लाजवाब है। फिल्म हमारे परम्परागत गुरुकुल व्यवस्था की याद ताजा कर गई।

हमरा नजरिया

चूंकी सिनेमा समाज का आईना होती है तो इस विषय यानी हमारी शिक्षा पद्धति पर सवाल उठाती और भी फिल्मो की दरकार और रहेगी।

बजट और कमाई

फिल्म की लागत 45 करोड़, 15 करोड़ विज्ञापन, वितरण, प्रदर्शन खर्च जोड़कर 60 करोड़।
फिल्म के सेटेलाइट अधिकार बेच दिए गए 60 करोड़ में थियेटर अधिकार 45 करोड़ में, संगीत अधिकार 10 करोड़ में बिक चुके है तो फिल्म अपनी लागत से दुगना प्रदर्शन के पूर्व ही निकाल चुकी है फिर भी पहले दिन की शुरूआत 8 से 12 करोड़ की हो सकती है अब जबकि भारत की वर्ल्ड कप से वापसी हो गई तो सन्डे को 25 से 35 करोड़ का सप्ताहांत मिल सकता है।

निष्कर्ष

फिल्म अभिप्रेरणा से भरपूर है, देश के हर छात्र के साध अध्यापक को भी फिल्म देख कर प्रेरणा लेनी चाहिए

सरकार को नैतिक जवाबदारी मानते हुए फिल्म टेक्स फ्री कर देना चाहिए
फिल्म आपकी परवाज को पंख लग देगी

शायद फिल्म हमारे देश की सरकार के कान तक पहुचने में भी कामयाब हो जो शिक्षा पद्धति पर भी अपना ध्यान दे पाएगी ??

फिल्म को 3.5 स्टार्स

समीक्षक
इदरीस खत्री

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here