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बेहद सशक्त उपन्यास है गाफिल | Sunil Chaturvedi’s Novel ‘GHAFIL’

Posted on: 22 Apr 2019 13:47 by Mohit Devkar
बेहद सशक्त उपन्यास है गाफिल | Sunil Chaturvedi’s Novel ‘GHAFIL’

आप अलहदा विषयों के गहन अध्ययन के बाद जो लिखते हैं वह मन पर अमिट छाप छोड़ता है। महामाया उपन्यास पढ़ने के बाद भी कई दिनों तक उसके प्रभाव में रही और गाफिल ने तो बस अपनी गिरफ्त में ही ले लिया।उपन्यास तो मिलने के अगले दिन ही पढ़ लिया था लेकिन उसपर ठीक से लिख पाऊँगी कि नहीं का असमंजस था जिसे तोड़ते हुए आज कुछ लिखने की कोशिश कर रही हूँ।

कहते हैं यादें इंसान की धरोहर होती हैं लेकिन भूलना मन की शांति और जीवन में आगे बढ़ने के लिए जरूरी होता है। यदि इंसान भूले न तो उलझकर रह जायेगा उन्हीं बातों और यादों में लेकिन भूलने के बाद भी क्या वाकई सब कुछ भूला जा सकता है ? अवचेतन मन में यादें फ्रीज़ रहती हैं जो जीवन की आपाधापी में बाहर न आ पाएं लेकिन किन्हीं विशेष लम्हों की तपिश में किसी बड़े सदमे में ठहराव में वे किसी चंचल नदी की तरह बह निकलती हैं और बहा ले जाती हैं बहुत कुछ। ये बहुत कुछ कभी पूरे जीवन के प्राप्य भी हो सकते हैं और अंत में जो बचता है वह होता है कभी खो दिए को भूल जाने का अवसाद अपनी गलतियों का मलबा और एक छटपटाहट।
तो फिर हासिल क्या है भूल जाना या याद रह जाना ? गाफिल शायद इन दोनों स्तिथियों के बीच का संतुलन है जो क्या भूलूँ क्या याद करूँ के साथ खड़ा होता है।

सुनील चतुर्वेदी जी का उपन्यास गाफिल इसी प्रश्न को लेकर एक ताना बाना बुनता है जिसमें एक बड़े और सफल आदमी के जीवन का ऐसा सच उस समय सामने आता है जब वह हॉस्पिटल में आई सी यू में पड़ा है। उपन्यास आगे बढ़ते हुए पीछे छूट जाने और छोड़ दिए जाने की कसक पाठक के मन में छोड़ता है। एक कथित बड़े आदमी के आसपास की दुनिया के साथ ही हॉस्पिटल की व्यवस्थाओं की पोल खोलता मरीज की हैसियत को भुनाता सिस्टम काम करते डॉक्टर नर्स की रूटीन बेजार जिंदगी के साथ उनकी कुछ निजी भावनाओं की कहानी भी कहता चलता है।
दो बेहद अलग दुनिया के लोगों की जीवन शैली भावनाएं उनके सुख दुःख राग द्वेष स्वार्थ और लगाव कहानी में इस तरह गुंथे हैं कि लेखक किसी को अपनी तरफ से सही और गलत न बताते हुए फैसला पाठकों पर छोड़ते हैं और पात्रों के किरदार उसके अवचेतन में बस जाते हैं। ११२ पेज के उपन्यास का फलक पृष्ठों की संख्या लांघकर बेहद बड़ा हो जाता है जब एक डॉक्टर व्यवसायिकता और व्यवस्था के बीच अपने काम से ऐसा कारनामा कर जाता है कि पाठक के उदास होते चेहरे के भाव बदल देता है।
एक बेहद रोचक कथावस्तु और सुघड़ भाषा के साथ यह उपन्यास आपके मन में घर कर जायेगा ऐसा मेरा विश्वास है।
कविता वर्मा

गाफिल
लेखक सुनील चतुर्वेदी
अंतिका प्रकाशन
मूल्य 140/

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