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“रूप की रानी” से जिंदा हुई श्रीदेवी की दास्तान

Posted on: 11 Jul 2019 14:46 by Ayushi Jain
“रूप की रानी” से जिंदा हुई श्रीदेवी की दास्तान

मुंबई : श्रीदेवी भले ही अब हमारे बिच नहीं है लेकिन ललिता अय्यर ने उन्हें फिर से ज़िंदा कर दिया हैं। ललिता अय्यर की पुस्तक ‘रूप की रानी’ श्रीदेवी बनाई है जिसमे उन्होंने श्रीदेवी को फिर से हिंदी हार्टलैंड में जीवित कर दिया हैं। ललिता अय्यर की यह किताब अंग्रेजी में क्वीन ऑफ हार्ट्स के नाम से है और इसको हिंदी में अनु सिंह चौधरी ने लिखी हैं। श्री देवी को हमेशा से ही उनकी खूबसूरती और उनके चुलबुले अंदाज के लिए जाना जाता था और आज भी वो लोगो के दिल में अपनी जगह बनाई हुई है।

बॉलीवुड की सबसे ज्यादा सफल हीरोइनों में से एक श्रीदेवी के जीवन से जुड़े रोचक किस्से, घटनाएं इस पुस्तक में इस तरह लिखे गए हैं कि उन्हें पढ़ने के दौरान कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि श्रीदेवी अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से आपको देख रहीं हैं। ललिता अय्यर ने उनकी इस पुस्तक में श्रीदेवी के हर छोटे से छोटे पलों को बताया है। साथ ही इस बात को भी बहुत सहजता से बताया है कि कैसे श्रीदेवी का अभिनय उन्हें बारबार अपनी मां से जोड़ देता रहा।

आपको बता दे कि जब आप इस पुस्तक को पड़ेंगे तो आपको प्रतीत होगा कि कैसे अप्रतिम सौंदर्य की देवी, डांस की मल्लिका, शानदार कॉमेडियन और अदाकारा श्रीदेवी ने पुरुषप्रधान बॉलीवुड और बॉक्स ऑफ़िस पर पहली सुपरस्टार एक्ट्रेस होने का मैडल हासिल किया था। इस पुस्तक में श्रीदेवी के पुरे जीवन का दृश्य बताया है। श्रीदेवी के शुरवाती करियर से लेकर कैसे उनका करियर ागफे बड़ा तब तक का पूरा सफर इस पुस्तव में बताया।

साथ ही उन्होंने इसके माध्यम से सिनेमा जगत में बाल-कलाकारों पर होने वाले शोषण पर भी प्रकाश डालने की कोशिश की है। साथ ही यह पुस्तक जितनी श्रीदेवी के बनने, उनकी जद्दोजेहद और संघर्षों की कहानी है, उतनी ही एक स्त्री और एक नायिका के रूप में श्रीदेवी को दी गई श्रद्धांजलि भी है!

इसको लेकर लेखिका ने एक किस्से का वर्णन करते हुए लिखा है –

कैमरे के सामने पहली बार आने के बारे में श्रीदेवी ने खालिद मोहम्मद को बताया : हां, वो दिन मेरी याद में अभी तक ताज़ा है। मैं अपनी मां के साड़ी का पल्लू के पीछे छुपी हुई थी। लेकिन मां ने कहा, “पप्पी डरने की कोई बात नहीं है.” मैंने मां की बात पर यकीन कर लिया और बस वहां से शुरुआत हो गई। मुझे उसके बाद कोई छुट्टी नहीं मिली। आमतौर पर कहा जाता है कि बाल कलाकारों, खासकर चाइल्ड स्टारों को, बहुत मुश्किल दौर से गुजरना पड़ता है। मेरे साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

लेकिन मुझे याद है कि एक बच्चा था जो मेरे साथ एक्टिंग कर रहा था। हमें एक सीन में रोना था और मैं बात-बात पर रो पड़ती थी। लेकिन दूसरे बच्चे को तभी रोना आता था जब उसकी मां उसे जोर से चिकोटी काटती थी। मैंने ग्यारह साल की उम्र में तेलुगु फिल्म अनुरागलू के साथ हिरोईन के रूप में भी काम करना शुरू कर दिया। मैं उसमें एक अंधी लड़की की भूमिका निभा रही थी और मुझे बस इतना करना था कि कैमरे की ओर अपनी खाली नज़रों से देखना था। मैं आज्ञाकारी बच्ची थी शायद। वही करती थी जो डायरेक्टर मुझे करने को कहते थे.’

श्रीदेवी का करियर –
श्रीदेवी का जन्म 13 अगस्त 1963 को तमिलनाडु में हुआ था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत महज चार साल की उम्र में एक तमिल फिल्म कंधन करुणई से कर दी थी। उन्होंने बाल कलाकार के रूप में तेलुगू और मलयालम फिल्मों में भी अभिनय किया था। दक्षिण भारतीय फ़िल्मों में काम करने के बाद श्रीदेवी ने साल 1979 में बतौर मुख्य कलाकार फ़िल्म ‘सोलहवां साल’ से अपने हिंदी फ़िल्म करियर की शुरुआत की थी। उसके बाद उन्होंने कई सारी फिल्में करी। साल 2017 में श्रीदेवी की फिल्म ‘मॉम’ रिलीज़ हुई थी। श्रीदेवी ने फ़िल्मों में लंबी पारी खेली और ‘मॉम’ उनकी 300वीं फ़िल्म थी। फ़िल्मों को उनके योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री से नवाज़ा गया था।

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