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“यदि छुआछुत पाप नहीं है तो कुछ भी पाप नहीं है।”

Posted on: 17 Jun 2018 08:06 by Mohit Devkar
“यदि छुआछुत पाप नहीं है तो कुछ भी पाप नहीं है।”

यह कहने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक श्री मधुकर दत्तात्रेय देवरस उपाख्य बालासाहब देवरस की आज
#पुण्यतिथि है.
बालासाहब देवरस का जन्म 11 दिसम्बर 1915 को नागपुर में हुआ था। बालासाहब ने संघकार्य में अनेक नए आयाम जोड़े। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है सेवा बस्तियों में चलने वाले सेवा कार्य। बालासाहब के ही कार्यकाल में संघ का विस्तार देशभर में तहसील स्तर तक पहुंचा। देशभर में एक ओर जहां शाखाओं का व्यापक स्तर पर विस्तार हुआ वहीं उनके 21 वर्षों के कालखण्ड में संघ परिवार के संगठन भी ताकतवर हुए ।
1925 में संघ की स्थापना के कुछ समय बाद ही वे डॉ. हेडगेवार के सम्पर्क में आए। 1939 में वे प्रचारक बने, तो उन्हें बंगाल भेजा गया; पर 1940 में डा. हेडगेवार के देहान्त के बाद उन्हें वापस नागपुर बुला लिया गया। इसके बाद लंबे समय तक उनकी गतिविधियों का केन्द्र मुख्यतः नागपुर ही रहा। नागपुर से प्रचारकों की एक बहुत बड़ी फौज तैयार कर पूरे देश में भेजने का श्रेय बालासाहब देवरस को ही जाता है। यहाँ से जो प्रचारकों की खेप पूरे देश में भेजी गई उसमें स्वयं उनके भाई भाऊराव देवरस भी शामिल थे, जिन्हें उत्तर प्रदेश भेजा गया था। भाऊराव ने लखनऊ में पं दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे लोगों को संघ से जोड़ा।
1948 में जब गांधी हत्या का झूठा आरोप लगाकर संघ पर प्रतिबन्ध लगाया गया, तो बालासाहब ने उसके विरुद्ध सत्याग्रह के संचालन किया। वे 1965 में सरकार्यवाह बनें तथा श्री गुरुजी के देहान्त के पश्चात् 1973 में सरसंघचालक बने। दो साल बाद ही 4 जुलाई 1975 को संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। उनके नेतृत्व में संघ ने इस प्रतिबन्ध का सामना किया।

1994 तक सरसंघचालक के रूप में उन्होंने दायित्व निभाया। जब उनका शरीर प्रवास योग्य नहीं रहा, तब उन्होंने श्री रज्जू भैया को सौंप कर पद त्याग का उदाहरण प्रस्तुत किया। सन 1996 में आज ही के दिन 17 जून कोअपना शरीर छोड़ने के पूर्व ही उन्होंने निर्देश दिया कि उनका दाह संस्कार सामान्य व्यक्ति की भांति सार्वजनिक स्थल पर किया जाए।अपने जीवित रहते हुए ही उन्होंने जो पत्र लिखा था उसमें दो बातें प्रमुख थी। एक कि उनके नाम पर कहीं भी स्मारक का निर्माण न कराया जाए और दूसरा यह कि संघ के कार्यक्रमों में आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार और द्वितीय सरसंघचालक गुरूजी के अलावा अन्य किसी सरसंघचालक का चित्र नहीं लगाया जाएगा।

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