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अनगिनत छात्रों को बोलना सिखाने वाले शीतला मिश्र चुपके से चले गए

Posted on: 02 Jan 2019 10:42 by Surbhi Bhawsar
अनगिनत छात्रों को बोलना सिखाने वाले शीतला मिश्र चुपके से चले गए

कीर्ति राणा

आज से दशकों पहले कहाँ इतनी समझ थी कि बोलने का सलीक़ा क्या हो और सुनने का संयम कैसा हो। तब इंदौर ही नहीं प्रदेश की सीमाओं के बाहर तक एक नाम बड़ा जाना पहचाना था डॉ शीतला मिश्र। जो अपनी वाग्मिता क्लास के कारण स्कूल-कॉलेज स्टूडेंट्स में बेहद लोकप्रिय थे।तुतलाते हुए बच्चे को पहले परिजन बोलना सिखाते हैं, घर-परिवार और आसपास के वातावरण को देख-समझ कर बच्चा बोलना सीख जाता है। लेकिन वह कब बोले, कैसा बोले, सिर्फ बोले ही नहीं दूसरे की बात सुनने का संयम भी हो, किसी के विचार से असहमत हो तो अपनी असहमति कैसे जाहिर करे, ऐसा बोले कि किसी को अप्रिय ना लगे, किसी के सम्मान को ठेस ना पहुंचे यह सारा बोल व्यवहार वाग्मिता क्लास के माध्यम से डॉ शीतला मिश्र सिखाते थे। उनकी क्लास अटैंड करने वाले ऐसे अनेकों छात्रों में व्यवसायी राजेंद्र चौहान से लेकर देश के वरिष्ठ पत्रकार (दिवंगत) रवींद्र शाह भी रहे हैं ये लोग अपने बोल व्यवहार से सम्मोहित करने में माहिर रहे तो उसकी वजह सर की वाग्मिता क्लास का प्रभाव ही रहा है।

सेंट्रल स्कूल पुडुचेरी और पचमढ़ीमें टीचर रहते उन्हें लगा कि बच्चों की शिक्षा से कहीं अधिक जरूरी है कि वे संवाद की भाषा समझें लिहाजा उन्होंने सेंट्र स्कूल की नौकरी छोड़ कर वाग्मिता क्लास लेना शुरु कर दी। इंदौर आए तो कुछ साल आयके डिग्री कॉलेज में हिन्दी के प्रोफेसर रहे। साथ में वाग्मिता की क्लासेस-कोर्स भी कराते रहे उन वर्षों में इंदौर के शिक्षण संस्थानों में वाणी खेल आयोजित किए करीब एक पखवाड़े चलने वाले वाणी खेल में बच्चों को शब्द चयन से लेकर वक्तृत्व कला में अपनी प्रतिभा दिखाना पड़ती थी।यूटीडी में डॉ शीतला मिश्र, रवींद्र शाह वाग्मिता (कम्यूनिकेशन) की क्लासेस लिया करते थे। सर ने बोलना तो है, बोल व्यवहार, बोलना तो पड़ेगा आदि पुस्तकें भी लिखीं।उनकी पत्नी वसुधा मिश्रा भी बच्चों की लिखावट सुधार की क्लासेस लेती हैं।

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