सबसे कम उम्र में शंकराचार्य बन गए थे ब्रह्मलीन स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि महाराज

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जगद्गुरु शंकराचार्य और पद्मभूषण पूज्य गुरुदेव स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि महाराज का मंगलवार को निधन हो गया। महाराज सुबह अपना पाञ्चभौतिक शरीर त्यागकर ब्रह्मलीन हो गए हैं। बुधवार को शाम 4 बजे भारत माता जनहित ट्रस्ट के राघव कुटीर के आंगन में समाधि दी जाएगी। उनके जीवन की बात करें तो काॅलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके मन संन्यासी बनने का विचार आया। इस दौरान उन्होंने 22 वर्ष की संन्यासी बनने का फैसला ले लिया।

इसी बीच सत्यमित्रानन्द गिरि की मुलाकात स्वामी वेदव्यासानंद महाराज से हुई और वे ही उनके गुरु बन गए। डॉ. सत्यमित्रानन्दगिरि महाराज ने अपने गुरु के साथ हिमालय भ्रमण किया और वे 27 वर्ष की आयु में शंकराचार्य बन गए। वे इस आयु में शंकराचार्य बनने वाले भारत के प्रथम संन्यासी थे। शंकराचार्य का पद त्यागने वाले भी वे एक मात्र ही थे क्योंकि वे आदिवासियों की सेवा करना चाहते थे। बताया जाता है कि गुरु और शिष्य में बहुत ही मधुर संबंध थे।

सत्यमित्रानन्द गिरि बताते थे कि उनके गुरुजी कभी चाय नहीं पीते थे और कभी चाय पीने का मौका आ भी गया तो उन्हें बहुत तेज पसीना आ जाता था। स्वामी सत्यमित्रानंदजी को सूती कपड़े का अचला और कौपिन पहनना बहुत पसंद था। हालांकि वह ऊपर एक नारंगी रंग का चद्दर ओढ़कर रखते हंै। सादा भोजन करने वाले जगद्गुरू शंकराचार्य को मीठा बहुत पसंद था। मीठे में भी मोदक उनका सबसे लोकप्रिय व्यंजन था।

बताया जाता है कि वह नियमानुसार दिन में तीन बार मोदक का सेवन करते थे। वे कहते थे कि मोदक खाने से मुंह से हमेशा मीठे शब्द निकलते हैं। सूती कपड़े पहनने के शौकीन स्वामी सत्यमित्रानंदगिरि महाराज हर साल गुरु पूर्णिमा के दिन अपने भक्तों को 400 मीटर सूती कपड़ा बांटता थे। देश-विदेश से भक्त प्रवचन सुनने आते हैं।

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