कभी दाजी को हराने के लिए तलाशे गए थे सेठी | Sethi was never searched for defeating Daji

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लोकसभा की अध्यक्ष भाजपा की दिग्गज नेता सुमित्रा महाजन का निर्वाचन क्षेत्र होने के कारण इंदौर सीट की चर्चा सारे देश में है। चर्चा का एक और कारण यह भी है कि 1989 के बाद से नौवीं से सोलहवीं लोकसभा तक के चुनाव लगातार जीतने के बाद भी इस बार पार्टी उन्हें फिर से लड़ाने में हीले-हवाले कर रही है। कभी अत्यंत लो प्रोफाइल नेता रहीं श्रीमती महाजन ने जीवन का पहला चुनाव इंदौर-३ विधानसभा से लड़ा और हार गई।

इसके बाद राम जन्मभूमि के चढ़ते माहौल के बीच उन्हें कांग्रेसी दिग्गज प्रकाशचंद सेठी के मुकाबले मैदान में उतारा गया और वे जीत भी गईं। उसके बाद तो उन्होंने पलटकर भी नहीं देखा। जहां तक प्रकाशचंद सेठी की बात है वे श्रमिक आंदोलन की उपज थे। पास के जिले उज्जैन में कांग्रेस के श्रमिक संगठन इंटक की नेतागिरी करते थे और जैन समाज से संबद्ध थे। उनसे पहले १९६२ में तेज तर्रार वामपंथी नेता होमी एफ दाजी इंदौर से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए थे। तब इंदौर में कपड़ा मिलें शबाब पर थी और जिसे श्रमिकों का समर्थन मिल जाए वही चुनाव जीत पाता था। दूसरी बड़ी लॉबी व्यवसायी वर्ग की थी।

उस दौर में इंदिरा गांधी ने तब के मुख्यमंत्री द्वारिका प्रसाद मिश्रा से कोई ऐसा नेता तलाशने को कहा जो श्रमिकों के साथ कारोबारियों में भी पैठ बना सके। इन दोनों पैमानों पर प्रकाश चंद सेठी खरे उतरे और उन्हें १९६७ में इंदौर लोकसभा क्षेत्र से मैदान में उतारा गया। उन्होंने जमकर चुनाव अभियान चलाया और एक-एक घर तक जाकर लोगों के पैर पड़कर मतदान करने की गुहार लगाई। जनसंपर्क करने का उनका यह अंदाज चल निकला और दाजी की प्रखर सभाएं उसके आगे फीकी पड़ गईं। उन्होंने पहला चुनाव दाजी को हराकर जीता और पहुंच गए केंद्र की राजनीति में।

इसके बाद तो उन्होंने सफलता की कितनी सीढ़ियां चढ़ी इसकी गिनती भी मुनासिब नहीं। इतना ही कहा जा सकता है कि दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और १९८४ में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई तो बतौर प्रधानमंत्री जिन दो कांग्रेसी नेताओं के नाम चले उनमें प्रणव मुखर्जी के साथ प्रकाशचंद सेठी भी थे। इसी कारण राजीव गांधी के सत्ता में आने पर उनकी पूछपरख कम हुई और १९८९ में जब राजीव के खिलाफ बोफोर्स तोप घोटाले में गड़बड़ का माहौल बना तो वे भी इंदौर सीट से हार गए। उसके बाद तो मृत्युपर्यंत राजनीतिक गुमनामी में ही रहे।

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