शौक से शुरू हुआ सेल्फी का सफर बीमारी तक पहुंचा

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नई दिल्ली। शौक से शुरू हुआ सफर बीमारी तक पहुंच गया है। सेल्फी से जुड़ी बीमारी को ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर नाम दिया गया है। यह एक दिमागी परेशानी है। इसमें शख्स खुद के खयालों में खोया रहता है। हर मौके और जगह को मोबाइल में कैद करने की आदत कई और परेशानियां बढ़ा रही है। आबोहवा के लिए भी खतरा है। सेल्फी के चलन के बाद फोटो खींचने का आंकड़ा दस गुना तक बढ़ गया।

एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2000 तक मोबाइल से 85 अरब फोटो खींचे गए, तब तक हाईटेक मोबाइल कुछ ही लोगों के पास थे। अगले दस साल में फोटो का आंकड़ा साढ़े तीन लाख करोड़ तक पहुंच गया। आने वाले दस साल में यह आंकड़ा सात लाख करोड़ तक पहुंचने के आसार हैं। फिलहाल, दुनिया में दो अरब से ज्यादा स्मार्ट फोन यूजर्स हैं। मोबाइल के कैमरे से खतरनाक तरंगें निकलती हैं, जो आबोहवा को खराब करती हैं। डाटा अपलोड होना भी बड़ी परेशानी बन गया है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट जैसी साइटों पर ज्यादा डाटा अपलोड होने के कारण नए डाटा सेंटरों की जरूरत पडऩे लगी है। साइटों को ये डाटा सेव रखना जरूरी है।

वो अपनी मर्जी से कुछ नहीं हटा सकते। फिलहाल, दुनिया में 7500 डाटा सेंटर हैं। 2020 तक इनमें इक्कीस फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है। फेसबुक, गूगल, अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट जैसी कई कंपनियां, जो डाटा सेव रखती हैं। बढ़ते डाटा की वजह से बिजली की खपत भी बढ़ रही है। बढ़ती आबादी और मोबाइल का बढ़ता इस्तेमाल दुनिया भर की आबोहवा का संतुलन बिगाड़ रहा है।
सेल्फी, चैटिंग एप्लीकेशन और वेब सीरिज के चलन ने मोबाइल के इस्तेमाल को बढ़ा दिया है। रही-सही कसर मोबाइल गेम ने पूरी कर दी है। लोग जैसे ही फ्री होते हैं, वो मोबाइल निकाल कर या तो वेब सीरिज देखने लग जाते हैं या गेम खेलने लगते हैं।

अस्पतालों में भी यह चीज जारी रहती है। वहां मरीजों को इससे नुकसान पहुंचता है। गार्डन, मैदान और दूसरी खुली जगहों में भी लोग मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं। आबोहवा के साथ-साथ जानवरों के लिए भी यह खतरनाक है। पिछले दिनों आई फिल्म ‘2.0Ó इसकी बानगी थी। दुनिया भर के कई सामाजिक संगठन मोबाइल के बढ़ते चलन पर फिक्रमंद हैं। आवाज भी उठा रहे हैं, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है। भारत में परेशानी ज्यादा है।

हमारे यहां दर्जन भर से ज्यादा नेटवर्क चलते हैं, जबकि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में दो या तीन नेटवर्क ही ज्यादा चलते हैं। वहां शुरुआत में मोबाइल का चलन ज्यादा था, लेकिन अब लोग समझने लगे हैं। फिलहाल, मोबाइल इस्तेमाल के मामले में एशियाई देश सबसे आगे हैं।

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