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‘लोकतंत्र की हत्या’ का दूसरा सिरा पश्चिम बंगाल में, अजय बोकिल की जबरदस्त टिप्पणी

Posted on: 18 May 2018 04:25 by Ravindra Singh Rana
‘लोकतंत्र की हत्या’ का दूसरा सिरा पश्चिम बंगाल में, अजय बोकिल की जबरदस्त टिप्पणी

क्या राजनीतिक दंबगई, हिंसा, नियम-कायदों और नैतिकता को ठेंगा हमारी राजनीति का स्थायी चरित्र बन गया है? यह सवाल इसलिए कि जिन्हें ‘कर्नाटक में लोकतंत्र की हत्या’ होते दिखाई देती है, उन्हें इसका दूसरा सिरा ‘पश्चिम बंगाल में जम्हूरियत का कत्ले आम’ के रूप में नहीं दिख पाता। पश्चिम बंगाल के हाल में हुए पंचायत चुनाव में जो जबर्दस्त हिंसा हुई है, वह इस बात का संकेत है कि आगामी चुनाव वहां किस कीमत पर लड़े जाने वाले हैं। राज्य में पंचायत चुनाव के पहले, मतदान के दिन और नतीजे आने के बाद भी हिंसा का दौर चला है।

यह सचमुच चिंताजनक है। इस चुनावी हिंसा में 23 लोग मारे जा चुके हैं और कई घायल हुए हैं। मरने वालों में ज्यादातर विपक्षी पार्टियों खासकर माकपा और भाजपा के कार्यकर्ता हैं। इस बेलगाम हिंसा पर केवल भाजपा और माकपा ने ही विरोध जताया। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा लंगड़ी जीत के बाद दिल्ली में आयोजित जश्न में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव में हुई भयंकर हिंसा को ‘लोकतंत्र की हत्या’ बताया। केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने भी राज्य सरकार से इस हिंसा पर रिपोर्ट मांगी थी। हालांकि राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के नेता डेरेक अो ब्रायन ने आंकड़े देकर यह साबित करने की कोशिश की कि इस बार की हिंसा पिछले पंचायत चुनावों की तुलना में काफी कम है।

जो भी हो, इस हिंसा और मारकाट का ‘अनुकूल’ परिणाम मुख्य,मंत्री ममता बैनर्जी और उनकी पार्टी टीएमसी को मिला। वहां बीजेपी नंबर दो पर रही जबकि राज्य में बरसों राज करने वाली माकपा तीसरे स्थान पर चली गई है। उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल में 14 मई को 621 जिला परिषदों, 6 हजार 123 पंचायत समितियों और 31 हजार 802 ग्राम पंचायतों के लिए मतदान हुआ था। इनमें करीब 73 फीसदी लोगों ने वोट डाले थे। नतीजों में जिला परिषदों के चुनाव में तो टीएमसी ने लगभग स्वीप किया है। अनके सीटों पर उसके प्रत्याशी ‘निर्विरोध’ जीते।

बंगाल में चुनावी हिंसा नई बात नहीं है। सीपीएम के जमाने से विचारधारा के आधार पर समाज का विभाजन ग्रास रूट लेवल तक हो गया है। राजनीतिक चेतना का अतिरेक भी कार्यकर्ताअों को मरने-मारने के लिए प्रेरित करता है। इसलिए हर चुनाव और खासकर स्थानीय स्तर का चुनाव मूंछ की लड़ाई में बदल जाता है। फर्क इतना है कि आज ममता बैनर्जी सीपीएम को उसी के आजमाए हथियारों से मात दे रही हैं। इस लड़ाई में भाजपा के रूप में एक और नया खिलाड़ी शामिल हो गया है। भाजपा भी यहां हर चुनाव आर-पार की मानसिकता से लड़ रही है। उसे भी साम-दाम-दंड-भेद से परहेज नहीं है। यही कारण है कि ज्यादातर चुनावों में भाजपा दो नंबर पर आती दिखती है। उसका वोट प्रतिशत लगातार बढ़ रहा है। हालांकि टीएमसी से वो बहुत पीछे है।

सवाल यह है कि आखिर पंचायत जैसे छोटे स्तर के चुनावों में भी इतनी हिंसा का कारण क्या है? क्या यह बंगाल का ही चरित्र है या फिर अब यह देशव्यापी केरेक्टर बन चुका है? क्यों पंचायत चुनाव इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं कि लोग इसके लिए अपनी जानें गंवाने के लिए भी तैयार हैं? क्यों सरकारों के लिए भी पंचायत तक अपनी राजनीतिक सत्ता का परचम फहराना इतना जरूरी हो गया है? इन तमाम सवालों के उत्तर बहुआयामी हैं।

ग्राम पंचायत हमारे लोकतं?त्र की बुनियादी इकाई है। इसीलिए पंचायतों पर कब्जा करना हर राजनीतिक पार्टी की चाहत होती है। पंच-सरपंच बनना गांव में रौब और अधिकार की निशानी है। इसे हासिल करने के लिए चुनाव में हिंसा, बूथ लूटना, प्रतिद्वंद्वी की हत्या, अपहरण, पैसा बांटना आदि हथकंडे अपनाए जाते हैं। आजकल तो मप्र जैसे ‘नरम’ राज्यों में भी पंच-सरपंच बनने के लिए बोलियां लगने लगी हैं। मसलन फलां व्यक्ति यह ऐलान कर देता है कि मैं गांव के विकास के लिए इतना पैसा दूंगा। मेरे खिलाफ कोई चुनाव नहीं लड़ेगा। इसमें परोक्ष धमकी यह है कि कोई लड़ेगा तो उसे ‘देख’ लिया जाएगा।

लेकिन बात यहीं तक सीमित नहीं है। पंचायत चुनावों के हिंसक होते जाने का असली कारण है पंचायतों को केन्द्र व राज्य सरकार से सीधे मिलने वाला पैसा। इससे विकास की आकांक्षाअों के साथ ग्राम स्तर पर भ्रष्टाचार के नए रास्ते खुल गए हैं। उसका विकेन्द्रीकरण ग्रासरूट लेवल तक हो गया है। अधिकांश पंच-सरपंच इस राशि में हिस्सा लेते हैं। समझा जा सकता है ‍िक जो व्यक्ति लाखों की बोली लगाकर पंच-सरपंच बन रहा है, वह उससे दुगुना कमाने की उम्मीद पर ही ऐसा कर रहा है। सरकारी पैसे से गांव में कितना काम हो रहा है, उससे ज्यादा अहम यह है कि कितना पैसा लोगों की जेब में जा रहा है।

लेकिन यह चरित्र तो पूरे भारत में है। बंगाल में ही इतनी हिंसा क्यों? तो इसका जवाब यह है ‍कि ममता बैनर्जी राज्य में भाजपा के बढ़ते प्रभाव और आरएसएस की सक्रियता से परेशान हैं। उन्होंने सीपीएम और कांग्रेस को तो उन्हीं की शैली में काफी हद तक किनारे लगा दिया, लेकिन भगवा लहर को वो तमाम कोशिशों के बाद भी रोक नहीं पा रही हैं। क्योंकि राजनीितक स्तर पर बरसों ‘नास्तिकता के माहौल’ में पले बंगाल को आस्तिकता का यह ( दुर) आग्रह धीरे-धीरे आकर्षित करने लगा है। भाजपा बिना किसी दमदार नेता के भी तीसरे विकल्प के रूप में उभर रही है।

दूसरा बड़ा कारण अगले साल लोकसभा चुनाव होना भी है। टीएमसी बारिश पूर्व मेंटेनेंस की तरह अपना वोट बैंक एकबार फिर सुरक्षित और संरक्षित कर लेना चाहती थी। इसके लिए हर तरीका जायज था। पंचायत चुनावों में टीएमसी की लगभग एकतरफा जीत इस बात का संकेत है कि अगले लोकसभा चुनाव में भी पश्चिम बंगाल के नतीजे बहुत ज्यादा चौंकाने वाले नहीं होंगे। भाजपा की ताकत भले बढ़े, लेकिन विजय ध्वज ममता के हाथ ही होगा।

इसी तरह भाजपा, माकपा और कांग्रेस ने भी इस स्थानीय स्तर के चुनाव के माध्यम से अपने-अपने वोट बैंक को सहेजने और परखने की कोशिश की है। यह बात अलग है ‍िक इस कोशिश ने भी भारी हिंसा का रूप ले लिया। वास्तव में यह 2019 के आम चुनावों की ‍िरहर्सल थी। जिसका साध्य सत्ता है और सत्ता के संघर्ष में प्राणों के साथ-साथ नैतिकता की बलि चढ़ जाए तो भी चिंता कौन करता है। लोकतं‍त्र की हत्या दोनो जगह हो रही है और इस अर्थ में कर्नाटक तथा पश्चिम बंगाल कोई खास फर्क नहीं है।

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