सफलता का दूसरा नाम, भूपिंदर त्रिपाठी|Second name of success, Bhupinder Tripathi

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यदि हौसलों में दम होतो कोई भी मुकाम आसानी से पाया जा सकता हैं. बता दे आज बहुत से छात्र पढाई में असफल होने के कारण मौत को गले लगा लेते हैं| पर कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो बार-बार असफल होकर भी हार नही मानते और आखिर में सफता प्राप्त करते हैं|

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ऐसी ही कहानी कुछ रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की अहमदाबाद ब्रांच में मैनेजर भूपिंदर त्रिपाठी की हैं| उनका संघर्ष विषम परिस्थितियों में न केवल जीवन जीने का जज्बा पैदा करता है, बल्कि आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देता है। वह साल 2016 में दिव्यांग श्रेणी में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की परीक्षा 93 प्रतिशत अंकों के साथ पास करने वाले पहले भारतीय हैं। भूपिंदर त्रिपाठी को करीब पांच साल पहले कैंसर हो गया था। इसके बाद आंखों की रोशनी भी चली गई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। इतना सब कुछ होने के बाद भी भूपिंदर त्रिपाठी ने हार नही मानी और ब्रेल लिपि सीखी और दोबारा मुकाम पाया साल 2012 में उन्हें रीढ़ की हड्डी का कैंसर हो गया, इसका पता लास्ट स्टेज में चला। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया इससे जिंदगी तो बच गई, लेकिन उनकी आंखों की रोशनी चली गई। भूपिंदर ठीक होकर जब अस्पताल से बाहर निकले तो उनके लिए हर तरफ अंधेरा था। उन्होंने ब्रेल लिपि सीखी। दिन रात मेहनत की और नेत्रहीनों के लिए संचालित होने वाली परीक्षा में पहला स्थान पाया। साल 2015 में आरबीआई में उनकी जॉब लगी। साल 2016 में दिव्यांग श्रेणी में आईएमएफ की परीक्षा पास करने पर उन्हें मैनेजर पद पर प्रोन्नति दी गई।

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