सिंधिया मां-बेटेः दल बदलकर पहुंचे शीर्ष तक | Scindia mother-son: Defected to top of reach

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Jyotiraditya-Scindia

बात राजनीति की करें तो कांग्रेस के साथ ही भारतीय जनता पार्टी में भी ग्वालियर के Scindia सिंधिया राजघराने का नाम आदर से लिया जाता है। कभी इस घराने की माता विजयाराजे सिंधिया और उनके पुत्र माधवरावव सिंधिया क्रमशः भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस में बड़े ही सम्मानित नाम थे। माधवराव सिंधिया तो कई बार केंद्रीय मंत्री तक बने। वहां भाजपा के संस्थापकों और संरक्षकों में राजमाता का नाम लिया जाता रहा। यह अद्भुत संयोग है कि दोनों मां-बेटे ने अपनी संसदीय यात्ररा विपरीत राजनीतिक विचारधारा से प्रारंभ की थी।

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राजमाता ने जीवन का पहला लोकसभा चुनाव 1957 में गुना से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में लड़ा और जीता था। दूसरा चुनाव उन्होंने 1962 में ग्वालियर से बतौर कांग्रेस उम्मीदवार ही लड़ा और जीता। 1967 में वे फिर गुना से सांसद बनीं। तब वे स्वतंत्र पार्टी की उम्मीदवार थीं। इसके बाद उन्होंने लगातार चार चुनाव 1989, 1991, 1996 और 1998 में गुना संसदीय क्षेत्र से ही लड़े औऱ जीते। ये सारे चुनाव भारतीय जनता पार्टी(BJP) के बैनर तले लड़े गए। उधर कांग्रेस के दिग्गज नेता बने माधवराव सिंधिया ने संसदीय राजनीति की शुरुआत 1971  में गुना लोकसभा सीट से की थी।

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1977 के चुनाव में वे निर्दलीय लड़े और जीते। फिर उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा और 1980 व 1989के चुनाव में भी विजयी पताका फहराई। ये चुनाव भी उन्होंने गुना से ही लड़े थे। इस बीच 1984 में उन्होंने ग्वालियर सीट से अटलबिहारी वाजपेयी को शिकस्त दी थी। तब पार्टी ने उन्हें टिकट तो ग्वालियर से दिया था, लेकिन अंतिम क्षणों में ग्वालियर से मैदान में उतारा। तब महेंद्रसिंह कालूखेड़ा गुना के सांसद बने थे। माधवराव सिंधिया के विमान दुर्घटना में निधन के बाद से लगातार चार बार उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया चुनाव जीतते रहे हैं। इसमें 2002 का उपचुनाव और 2004, 2009 और 2014 का आमचुनाव शामिल है।

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