सरताज के आंसू, बगावती साला, उसूलों का कत्लेआम और ‘टिकट के जिहादी’!

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अजय बोकिल

महर्षि वेद व्यास अगर महाभारत का सीक्वल लिखना चाहें तो ‘चुनाव टिकट वितरण’ से बेहतर कोई प्लाॅट शायद ही हो। कारण इसमें जितना थ्रिल, घमासान, मूल्यों का कत्लेआम, घनघोर भाई भतीजावाद, एक इंच भूमि भी प्रतिद्वंदी के लिए न छोड़ने का दुर्योधनी संकल्प, अपने को उपकृत करने का राजहठ और अपने ही मानकों का जैसा निर्लज्ज चीरहरण हो रहा है, उससे पांडव तो क्या खुद कौरव भी शर्मा जाते। एक अदद चुनावी टिकट के लिए लोग न जाने क्या-क्या दांव पर लगाने को तैयार हैं। ‘टिकट जिहादी’ न जाने किन-किन समझौतों और धतकरम करने को तैयार हैं। क्लायमेक्स तो यह रहा कि मध्य प्रदेश में टिकट न मिलने पर (कल तक) भाजपा के नेता रहे सरताज सिंह ने अपने गृह क्षेत्र में जिस तरह जार-जार आंसू बहाए, उतने तो पांडवों ने युद्ध में अपनों को गंवाने के बाद भी नहीं बहाए होंगे। टिकट के लिए एक ‘साले’ ने पाला बदला और जीजा को दुश्मन बताया, वह भी बेमिसाल है।
मजे की बात यह कि हर चुनाव टिकट वितरण के पहले जिस तरह के बड़े-बड़े बोल बोले जाते हैं, नियमों-कायदों की बात होती है, क्राइटेरिया की अभेद्य दीवारों के दावे होते हैं, नैतिकता के जो बैरिकेड्स खड़े किए जाते हैं, वह चुनाव नामाकंन की आखिरी तारीख आते-आते ‘जिताऊ उम्मीदवार’ जैसे अबूझ और अनिवार्य जुमले में तब्दील हो जाते हैं। महाभारत की लड़ाई तो अपनो से ही अपनी जमीन पाने के लिए हुई थी। लेकिन टिकट की लड़ाई अपनी जमीन बचाने के लिए होती है। इसमें कब अपना पराया हो जाए और कम पराया अपना लगने लगे, कोई नहीं जानता और जानना भी नहीं चाहता।
टिकट वितरण की ताजा ट्रैजिडी का क्लायमेक्स भाजपा के दिग्गज और अनबीटन नेता रहे सरताज सिंह के आंसुअों में देखने को मिला। कैमरों के सामने उन्होंने भगवा आंखों से झरते रंगहीन आंसुअों से यह संदेश देने की कोशिश की कि भाजपा कितनी बेवफा है और अपने ही बुजुर्ग नेताअों को ‘मार्गदर्शक मंडल’ में एडमिट कराने के लिए किस कदर उतावली है। यहां तक ‍िक उसे दाढ़ी-मूंछ रखने वाले नेताअों से भी कोई हमदर्दी नहीं है ( पार्टी की कमान ऐसे ही शीर्ष नेताअो के हाथ है)। कल तक अपनी सेहत ठीक न होने से चिंतित सरताज में समर्थको ने न जाने क्या हवा भरी कि उनके बूढ़े हाथों ने बगावत की तलवार लहरा दी। केसरिया दुपट्टा छोड़ वो तिरंगा उत्तरीय गले में डालकर कांग्रेसी खेमे में वंडर ब्वाॅय की तरह नजर आए। हेमलेट जैसी असमंजस की मनस्थिति से निकल कर ‘यल्गार’ की मुद्रा में दिखे। कांग्रेस नेता दिग्विजय के साथ तस्वीर खिंचाते वक्त सरताज की आंखों में बाल सुलभ आश्वस्ति झलक रही थी।
टिकट वितरण के इस महानाट्य में जैसे-जैसे प्रत्याशियों की सूचियां जारी होती गई, वैसे-वैसे कई दावेदारों के अरमानों पर पत्थर पड़ते गए तो कई ने बिना कुछ गाए-बजाए ही महफिल लूट ली। चुनाव टिकट पाना नेताअों के ‍िलए कितना बड़ा जीवन-मरण का प्रश्न है, यह इसी बात से सिद्ध हुआ कि आला कमान को डराने-धमकाने अथवा दबाव में लाने के लिए हर हथकंडे अपनाए गए। इनमें से एक था नामांकन फार्म खरीदी की शर्तिया ब्लैकमेलिंग ट्रिक। भोपाल की ‍गोविंदपुरा सीट पर यह काम भी कर गई। वहां अविजित बाबूलाल गौर खुद टिकट पाने की रेस मे भले पिछड़ गए हों, लेकिन बहू कृष्णा गौर को टिकट दिलाने में किसी तरह कामयाब रहे। उधर कांग्रेस के पुराने नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी के बेटे को पार्टी ने ‍िटकट नहीं दिया तो उन्होने बेटे को समाजवादी पार्टी से लड़वाने का तय कर लिया। यानी सिनेमा की बालकनी का टिकट न ‍िमला तो थर्ड क्लास में दमदारी से जा बैठे। मगर पिक्चर देखेंगे जरूर !
टिकट की इस लाजवाब जंग में इंदौर की ताई-भाई की लड़ाई सबसे हैरतअंगेज थी। असमाप्त युद्ध शैली की इस लड़ाई में यूं एक कतरा भी खून नहीं ‍िगरा, लेकिन जिगर कइयों के घायल हुए। इंदौर में टिकटों की जमावट कुछ इस तरह हुई कि मैं नहीं तो और भी नहीं। टिकट बंटवारे के इस महापुराण में कुछ दिलजले टिकट वंचितों ने पार्टी टिकट बेचे जाने के चौंकाने वाले ऐसे ‘खुलासे’ किए, जो नोटबंदी को भी झटका देने वाले थे। मसलन भाजपा ने रतलाम ग्रामीण से मौजूदा विधायक मथुरालाल डामोर का टिकट काटकर दिलीप मकवाना को प्रत्याशी बनाया। मकवाना आशीर्वाद ( यह टिकट पाने वाला टिकट वंचित से लेने जरूर जाता है) डामोर के पास पहुंचे तो उन्होंने घर आए मेहमान का अपमान यह आरोप लगाकर किया कि उसने यह टिकट डेढ़ करोड़ में खरीदा है। इसी तरह इंदौर क्रं. 1 से प्रत्याशी संजय शुक्ला के समर्थको ने उन्हें टिकट न मिलने के पहले तक अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेताअो पर पैसा लेकर टिकट बांटने का आरोप लगाया। लेकिन जैसे ही खुद उन्हें टिकट मिला तो सभी नेता पाक साफ नजर आए। अलबत्ता इससे आम मतदाता को भाजपा और कांग्रेस के बीच ‘रेट डिफरेंस’ का पता जरूर चल गया।
टिकट बांटने की प्रक्रिया में एक ‘सर्वे’ नामक भांग की गोली भी जरूर रहती है। यह सर्वे कई एजेंसिंयों द्वारा अलग-अलग मकसद और तरीकों से कराया जाता है। इसका वास्तविक उद्देश्य क्या होता है, यह सर्वे कराने वाला भी ठीक से नहीं जानता, लेकिन जब असली टिकट बंटवारे की बात आती है तो यह नशा चुपके से उतर जाता है। दावेदार को टिकट मिलने से ज्यादा चर्चा टिकट न ‍िमलने पर होने वाली अनिवार्य प्रतिक्रियाअो की होती है। मसलन टिकट वंचित के समर्थक कार्यकर्ताअों का गुस्साना ( बाकी टाइम ये नदारद रहते हैं), कुर्सियां फेंकना, पार्टी से सामूहिक इस्तीफे देना( फिर पिछले दरवाजे से लौट आना), पार्टी को बर्बाद हो जाने का श्राप देना या फिर खुद बर्बाद हो जाने का ऐलान करते हुए छाती कूटा करना, जहर खा लेना (असली?), पार्टी के श्राद्ध की नीयत से खुद मुंडन कराना, स्वयं को पार्टी का त्राता सिद्ध करने की कोशिश करना, पार्टी की अहर्निश और निष्काम भाव (‍ टिकटाभिलाषा को छोड़कर) से सेवा के दावे करना, चुनाव जीतने अथवा हरवाने के लिए गधे को भी बाप बनाने में संकोच न करना आदि शामिल है।
इस टिकट-महाभारत का सबसे रोचक अध्याय परिवारवाद का घोर संरक्षण अथवा उसकी कटु आलोचना है। वैसे टिकट पाने, जुगाड़ने, झटकने, खैरात में मिलने या फिर दूसरे के हाथ से छीन लेने में जो रोमांच, रण-कौशल, दुस्साहस या मर्यादाअो का जैसा ‘गैंग रेप’ है, वो शायद ही और कहीं नजर आता हो। टिकट पाने की इस ‘मेथड’ का एक ही सूत्र वाक्य है कि जो हम करें वह पुण्य कार्य और अगला करे तो महापाप। रिश्तेदार अपना है तो गंगा नहाया हुआ तो अगले की ‍रिश्तेदारी टिकट के लिए अछूत समान। इसी तरह किसी पार्टी में शीर्ष स्तर पर सत्ता की दावेदारी वंश वाद तो चुनाव टिकट के लिए अपने परिजन की दावेदारी खालिस ‘सेवा का मेवा।‘
महाभारत काल में चुनाव नहीं थे, वरना इस महाकाव्य का सर्वाधिक रोचक, रक्तरंजित और मूल्यभंजित पर्व ‘टिकट संघर्ष’ ही होता। दरअसल चुनाव कोई जीते या हारे, लेकिन इसके लिए ‘टिकट का संघर्ष’ हमारे यहां लोकतांत्रिक मूल्यों का ऐसा कत्लेआम है, जिसकी दूसरी मिसाल शायद ही दी जा सके। टिकट बांटने वालों के लिए अगर यह अंगारों पर चलने जैसा है तो टिकट चाहने वालों के लिए यह अपने ही बनाए लाक्षागृह से बिना झुलसे निकलने जैसा है। ‍कवि रहीम के जमाने में अगर यह सब होता तो वह ‘रहिमन टिकट कबाडि़ए, बिन टिकट सब सून’ जैसा कोई दोहा लिखे बिना नहीं रह पाते। यह बात दूसरी है कि ‘टिकट जिहादियों’ को इन संवेदनाअोंसे कोई फर्क नहीं पड़ता।

( ‘सुबह सवेरे’ में दि. 10 ‍नवंबर 2018 को प्रकाशित)

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