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‘रेत की मछली’अकेली रचना ही नहीं…प्रखर पत्रकार कमलेश पारे की विशेष टिप्पणी

Posted on: 10 May 2018 04:05 by Ravindra Singh Rana
‘रेत की मछली’अकेली रचना ही नहीं…प्रखर पत्रकार कमलेश पारे की विशेष टिप्पणी

सरकारी नौकरी में गुंडा-नुमा छुटभैये नेताओं की सताई,जबलपुर की डॉ.रचना शुक्ल अकेली नहीं हैं.उनकी कुंठा तो इतनी अधिक बढ़ गई थी कि उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया.शेष कई महिला डाक्टर,छोटे बड़े नगरों या कस्बों में पदस्थ रहकर,अपने अपने कारणों से, परेशान होकर भी,अपमान सहकर भी मजबूरी में नौकरी कर रही हैं.गाँव-कस्बे का नेता जब किसी भी मरीज को लेकर अस्पताल पहुंचता है,तो उम्मीद करता है कि उसे तत्काल और अच्छे होने की गारंटी वाला इलाज़ मिले।

घर में मरीज को कितनी भी लापरवाही से रखा गया हो,इससे कोई मतलब नहीं,पर अस्पताल आते ही उसे श्रेष्ठ इलाज़ चाहिए,नहीं तो सब लोग लापरवाह और हरामखोर हैं.कई बार घर-परिवार की लापरवाही के कारण न्यूनतम हीमोग्लोबिन वाली,अस्पताल लाई गई महिलाओं के भी कुछ मिनिटों या घंटों में अच्छा होने की उम्मीद में नेता,भले ही वे किसी भी दल के हों,डाक्टर पर दबाव बनाते हैं।

डाक्टर यदि ऑपरेशन थियेटर में है,तो भी उनकी अपेक्षा रहती है कि वह बाहर आकर उनके मरीज को जल्दी से जरूर देखे.यदि सिस्टर किसी दूसरे मरीज को इंजेक्शन दे रही है,तब भी नेता अपना अधिकार मानते हैं कि उनके मरीज को इलाज़ पहले मिले.किसी भी राजनैतिक दल का नेता बनते ही,व्यक्ति अपने आप को’महाज्ञानी’जरूर मानने लगता है,फिर उपयुक्त शिक्षा पाए चिकित्सक या अर्ध-चिकित्सा कर्मचारी पर अपने ज्ञान का रौब गांठने लगता है।

सरकारी चिकित्सालयों में,चाहे वे कितने भी बड़े हों या छोटे,हमेशा साधनों और सुविधाओं का अभाव बना ही रहता है.इससे होने वाले झगड़ों का पहला शिकार वहां पदस्थ डाक्टर ही होता है.सबको सब कुछ तत्काल चाहिए,वह भी मुफ्त में.फिर,यदि डाक्टर महिला है,तो नेता का पौरुष कुछ ज़्यादा ही जोर मारता है।

आपराधिक मामलों में,संयोगवश यदि महिला डाक्टर की ड्यूटी के दौरान कोई प्रकरण आता है,तो अदालत में पेशी दर पेशी जो मान-अपमान मिलता है,उसे वे ही जानती हैं.इस पर पूरा ग्रन्थ लिखा जा सकता है,लब्बो-लुआब यही है कि ‘रेत की मछलियां’बहुत हैं,अकेली रचना ही नहीं।

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