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साहित्य अब जनोन्मुख नहीं उत्सवधर्मी होता जा रहा है

Posted on: 27 Oct 2018 10:26 by Surbhi Bhawsar
साहित्य अब जनोन्मुख नहीं उत्सवधर्मी होता जा रहा है

कवि, कथाकार डॉ. अभिज्ञात का कहना है कि साहित्य अब जनोन्मुख नहीं उत्सवधर्मी होता जा रहा है। अब रचनाएं सम्पादकों व प्रकाशकों के रहमोकरम पर नहीं। लेखक के पास सोशल मीडिया व इंटरनेट का विस्तृत माध्यम हैै। जाने-माने वामपंथी आलोचक अरुण माहेश्वरी सोशल मीडिया को अपनी अभिव्यक्ति का पहला प्लेटफार्म मानते हैं। फेसबुक पर लिखी टिप्पणियों की किताब भी छपी है- ‘तूफानी वर्ष 2014 और फेसबुक की इबारतें। बोधि प्रकाशन के प्रमुख मायामृग ने फेसबुक के रचनाकारों से स्त्री विषयों पर केन्द्रित कविताएं मांगकर पुस्तक प्रकाशित की ‘स्त्री होकर सवाल करती है’।

बोधि ने फेसबुक पर सक्रिय 100 कवियों की कविताओं को ‘शतदल’ के रूप में प्रकाशित किया है। छोटी कहानियों की भी डिमांड बढ़ी है। साहित्यिक मेले बढ़े हैं और इसमें लोगों की भागीदार बढ़ी है। साहित्यिक किताबें भी पहले की तुलना में अधिक बिक रही हैं। दिल्ली, जयपुर, मेरठ, गोरखपुर, लखनऊ के अलावा पटना, कोलकाता, माउंटेन इकोज साहित्योत्सव भूटान, असम में ब्रह्मपुत्र साहित्य उत्सव, मुंबई साहित्य उत्सव, शिमला में अंतरराष्ट्रीय साहित्य समारोह, सोलन-कसौली में साहित्य उत्सव, इंदौर साहित्य उत्सव हो रहे हैं।हिंदी फिल्म इंडस्ट्री अपने पटकथा लेखकों को महत्व देने लगी है।

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