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देवताओं का छुई-मुई ब्रह्मचर्य ?

Posted on: 30 Sep 2018 16:09 by Ravi Alawa
देवताओं का छुई-मुई ब्रह्मचर्य ?

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

केरल के सबरीमाला मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश पर जो फैसला सर्वोच्च न्यायालय ने दिया है, वह स्वागत योग्य है लेकिन फैसले के असली मुद्दे पर हमारे टीवी चैनलों, अखबारों और यहां तक कि जजों ने भी जो बहस चलाई है, वह बड़ी अटपटी है। लगभग सभी ने इसे स्त्रियों के मानव-अधिकार उल्लंघन कहा है। लेकिन यह ऐसा नहीं है।

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उस मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश पर रोक नहीं है। 10 वर्ष से कम और 50 साल से ज्यादा की स्त्रियां वहां जब चाहें तब जा सकती थीं। लेकिन जो रोक थी, वह 10 साल से 50 साल की औरतों पर थी। वह क्यों थी ? क्योंकि यह माना गया कि इस उम्र की औरतें रजस्वला होती हैं। उन्हें मासिक-धर्म होता है। रक्त-स्त्राव होता है। उस स्थिति को अपवित्र माना जाता है। वे अंदर जाएं तो मंदिर की पवित्रता भंग होती है। यह तर्क बिल्कुल गलत है।

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पहली बात तो यह कि 50 साल से भी अधिक उम्र की महिलाएं भी रजस्वला होती हैं। मंदिरवाले कैसे मालूम करेंगे कि कौन रजस्वला है और कौन नहीं ? यदि रजस्वला होने का अर्थ अपवित्र होना है तो लक्ष्मी, दुर्गा, पार्वती, सीता, राधा आदि स्त्रियां नहीं हैं क्या ? इन्हें मंदिरों में बिठाकर क्यों पूजा जाता है ? क्या इन्हें मासिक धर्म नहीं होता ? यदि रक्त-स्त्राव होता है तो उसे संभालने का हर औरत पूरा इंतजाम करती है।

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इसके अलावा यह तर्क तो बहुत खोखला है कि देव आयप्पा ब्रह्मचारी थे, इसीलिए वहां स्त्री-प्रवेश वर्जित था। अगर किसी ब्रह्मचारी का ब्रह्मचर्य किसी स्त्री की उपस्थिति मात्र से भंग हो जाता है तो उस ब्रह्मचारी को अपना मानसिक इलाज करवाना चाहिए। ऐसा व्यक्ति या देवता वास्तव में ब्रह्मचारी है या नहीं, यह शक पैदा हो जाता है। यदि देवताओं का ब्रह्मचर्य इतना छुई-मुई है तो ब्रह्मचारी कहलाने के लायक वे कैसे हो गए ? स्त्रियों पर इस तरह के प्रतिबंध लगानेवाले भक्तगण अपने देवताओं का ही अपमान करते हैं। यदि काली और दुर्गा जैसी देवियों के मंदिरों में पुरुषों के प्रवेश पर प्रतिबंध लग जाए तो आपको कैसा लगेगा ? सबरीमाला मंदिर ऊंचे पहाड़ पर स्थित है। उस तक पहुंचने के लिए 4-5 किमी पैदल चढ़ाई है। 10 साल से छोटी बच्चियां और 50 साल से बड़ी बूढ़ियां वहां तक पहुंचने में कितनी मुश्किलों का सामना करती होंगी ? इस तरह का पाखंड देश के दर्जनों मंदिरों में आज भी चल रहा है। इस तरह के सारे पाखंडों के विरुद्ध अदालतें पहल करें, उससे ज्यादा जरुरी है कि जनता स्वयं सीधी कार्रवाई करे।

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