रोमियो अकबर वाल्टर फिल्म निराश करती है | Romeo Akbar Walter Movie Review

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फिल्म समीक्षा चंद्रशेखर बिरथरे द्वारा

फिल्म ” रोमियो अकबर वाल्टर “जो सन 1971 के दौरान भारत बांग्लादेश युद्ध के कालखंड में एक जासूस की कहानी कहती है । फिल्म न तो जासूसी फिल्म कही जा सकती है ना एक्शन थ्रिलर । फिल्म की कहानी अविश्वसनीय है । फिल्म बहुत ही धीमी गति से चलती है एडिटर श्री निलेश गिरधर का संपादन बहुत कमजोर है ।

जॉन अब्राहम के अलावा फिल्म की कास्ट बेहद दोयम दर्जे की है । जैकी श्रॉफ रा चीफ के रोल में बिल्कुल नहीं जंचते हैं । मोनी राय बस नायिका की खानापूर्ति करती है अभिनय नहीं । मुदस्सर ( रघुवीर यादव ) कर्नल खुदा बक्श (सिकंदर खैर) इशाकअफ़रीदी (अनिल जॉर्ज ) हालांकि अच्छा अभिनय कर गए हैं । फिर भी फिल्म बेकार और ऊबाउ ही लगती है । सिकंदर खैर भविष्य में एक अच्छे खलनायक साबित हो सकते हैं । लोकेशन और सेटस बेहद मामूली से हैं उन पर ज्यादा काम नहीं किया गया है ।

फिल्मी में कव्वाली लगता है जैसे ठूंसी गई है । दूसरे गीतों की फिल्म में जरूरत महसूस नहीं होती । हनीफ शैख का पार्श्व संगीत कानफोडू होने के साथ-साथ शोर शराबा ही ज्यादा करता है ।

तपन तुषार बासु की सिनेमेटोग्राफी अच्छी है । मुझे नहीं लगता है फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कुछ कमाल कर पाएगी । रोबी ग्रेवाल द्वारा लिखी गई एवं निर्देशित फिल्म न देखी जाए तो ठीक ही है ।

चन्द्रशेखर बिरथरे
एक दर्शक ।

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