सूचना का अधिकार अब हमारे मौलिक अधिकारों का एक हिस्सा बन चुका है | Right to Information has now become a part of our fundamental rights

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RTI-

मोदी सरकार की कुदृष्टि अब केंद्रीय सूचना आयोग पर है। खबर आ रही है कि मोदी सरकार ‘सूचना के अधिकार’ RTI को पूरी तरह से कुचलने के मंसूबे बाँध रही है। श्रीधर आचार्युलू जैसे सूचना आयुक्त पर इनका बस नहीं चला इसलिए सूचना आयुक्तों की मुश्के कसने के लिए सरकार ने ब्‍यूरोक्रेट्स की अगुआई में ऐसी समितियां बनाने का प्रस्‍ताव तैयार किया है जो मुख्‍य सूचना आयुक्‍त (CIC) और सूचना आयुक्‍तों (ICs) के खिलाफ शिकायतों पर फैसला करेगा।

दरअसल CIC समेत सभी सूचना आयुक्‍त एक सुप्रीम कोर्ट जज के बराबर का दर्जा रखते हैं। इनकी नियुक्ति राष्‍ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की अध्‍यक्षता वाली समिति की सिफारिशों के आधार पर की जाती है। केंद्रीय सूचना आयोग और राज्य सूचना आयोग आरटीआई एक्ट, 2005 के तहत स्थापित एक सांविधिक संस्था है। सांविधिक संस्था उसे कहते है जिसे कोई कानून बनाकर स्थापित किया गया हो।

वर्तमान व्‍यवस्‍था के अनुसार, किसी सूचना आयुक्‍त के खिलाफ शिकायत आने पर उसे आयोग की बैठक में रखा जाता है। यह परंपरा रही है कि सूचना आयुक्‍तों के खिलाफ आने वाली शिकायतों पर मुख्‍य सूचना अधिकारी संज्ञान लेते हैं। अगर CIC के खिलाफ कोई शिकायत होती है तो उसे सूचना आयुक्‍तों की बैठक में रखा जाता है। RTI एक्‍ट की धारा 14 (1) कहती है कि आयुक्‍तों को केवल राष्‍ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है। वह भी तब, जब राष्‍ट्रपति की शिकायत पर सुप्रीम कोर्ट जांच कर उन्‍हें दोषी पाए।

लेकिन अब एक नयी व्यवस्था तामील की जा रही है नए प्रस्‍ताव सूचना आयुक्तों की शिकायत के सिलसिले में दो समितियां गठित करने की बात की गई है।

एक समिति CIC के खिलाफ आने वाली शिकायतों देखेगी और उसपर फैसले लेगी समिति में कैबिनेट सचिव, DoPT सचिव, एक रिटायर्ड CIC को रखने का प्रस्‍ताव दिया गया है।

दूसरी समिति सूचना आयुक्‍तों के खिलाफ शिकायतों पर निर्णय करेगी इस समिति में कैबिनेट सचिवालय के सचिव (समन्वय), DoPT सचिव और एक रिटायर्ड सूचना आयुक्‍त को रखने की योजना है।

सबसे खास बात यह है कि दोनों ही समितियों में, सरकारी अधिकारी बहुमत में होंगे, यानी सुप्रीम कोर्ट के जज के समकक्ष सूचना आयुक्त को अब ब्यूरोक्रेट्स का मुंह देखना होगा।

जब यह प्रस्ताव सूचना आयुक्तों की बैठक में सामने आया तो आयुक्तों ने एक सुर में इस प्रस्ताव का विरोध किया और उन्होंने मुख्य सूचना आयुक्त सुधीर भार्गव से सरकार को उचित जवाब भेजने का अनुरोध किया।

इस प्रस्ताव को सूचना आयुक्तों तक भेजने की हिम्मत मोदी सरकार की इसलिए हो गयी क्योंकि उन्होंने 11 सूचना आयुक्तों में से 4 अपने आदमी बैठा दिए हैं। पिछले दिनों श्रीधर आचार्युलू जैसे सूचना आयुक्तों के पद खाली हुए तो सरकार ने सुधीर भार्गव को नया मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त (सीआईसी) कर दिया और केंद्रीय सूचना आयोग में चार नए सूचना आयुक्तों की भर्ती भी की गई। ये नए चारो सूचना आयुक्त पूर्व नौकरशाह हैं.चारों अधिकारी इसी साल रिटायर हुए हैं। नव नियुक्त आयुक्त सुरेश चंद्र तो वित्त मंत्री अरुण जेटली के निजी सचिव भी रहे हैं।

आरटीआई क़ानून की धारा 12 (5) बताती है कि सूचना आयुक्त विधि, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, सामाजिक सेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता, संचार मीडिया, प्रशासन या शासन के क्षेत्र से नियुक्त किए जाने चाहिए. आरटीआई कानून में लिखा है कि कुल आठ क्षेत्रों से सूचना आयुक्तों का चयन होना चाहिए ताकि विविधता बनी रहे. लेकिन इन सिफारिशों को परे हटाते हुए ब्यूरोक्रेट्स को भर लिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने भी नॉकरशाह की नियुक्ति पर सवाल खड़े किये थे।

आपको याद होगा कि कुछ महीने पूर्व श्रीधर आचार्युलू जैसे सशक्त सूचना आयुक्त केंद्रीय सूचना आयोग में बैठे हुए थे तब उन्होंने उन डिफाल्टर के नाम सार्वजनिक करने को कहा था जो देश के हजारों करोड़ रुपये लोन के रूप में दबाए हुए हैं।

मित्र पूंजीपतियों के नाम सार्वजनिक करने की बात करने पर मोदी सरकार सूचना आयोग पर बुरी तरह से तिलमिलाई हुई थी इसलिए वह सूचना आयुक्तों पर सीधा नियंत्रण चाहती है।

मोदी सरकार पहले भी वह आरटीआई कानून में संशोधन प्रस्ताव लाने की बात कर के अपने कुटिल इरादे स्पष्ट कर चुकी हैं यह संशोधन भी आरटीआई एक्ट 2005 में निहित उद्देश्यों को खत्म करने के लिये लाया गया था, लेकिन आचार्यलु जैसे सूचना आयुक्तों के कड़े विरोध के कारण सरकार को अपने कदम वापस खींचना पड़ गए थे ।

अगर यह नया प्रस्ताव जिसमे ब्यूरोक्रेट्स को सूचना आयुक्तों पर नियंत्रण दे दिया जाने की बात की जा रही हैं पास हो जाता है तो आरटीआई कानून जैसे कानून की हत्या हो जाएगी जो हमारे मौलिक अधिकारों की गारंटी सुरक्षित करता है………..

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