सीबीआई को बर्बाद करने की जिम्मेदारी तो लेना पड़ेगी, राजेश ज्वेल की कलम से

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गुड गवर्नेंस का दावा देश की शीर्ष जांच एजेंसी सीबीआई के मामले में ही तार-तार हो गया है। कांग्रेस राज में अगर सीबीआई सरकारी तोता था, तो मोदी राज में उसके पंख ही नुच गए … यह जग जाहिर है कि सीबीआई का इस्तेमाल सत्ता विरोधियों को दबाने में करती आई है और मोदी राज में संवैधानिक संस्थाओं की बदहाली देश देख और भुगत रहा है। सुप्रीम कोर्ट पहुंचे आलोक वर्मा का यह बयान अत्यंत ही गंभीर और विचार योग्य है कि हर जांच सरकार के मुताबिक ही चले यह जरूरी नहीं है और सीबीआई को सरकारी दखल से बचाया जाना चाहिए।

कल तक कांग्रेस पर सीबीआई का दुरुपयोग करने का आरोप लगाने वाली भाजपा को तो सत्ता में आते ही नैतिक जिम्मेदारी के चलते सीबीआई को पूर्ण स्वतंत्र कर देना था। मगर उल्टा उसने भी कांग्रेस का ही अनुसरण किया और बद से बदतर हालात निर्मित कर दिए।अब सुप्रीम कोर्ट को 2 जी स्पैक्ट्रम और कोयला घोटाले की तर्ज पर जहां सीबीआई की सफाई बेरहमी से करना चाहिए और उसे स्वतंत्र बनाने के संबंध में भी कड़े आदेश देने चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने ही सीबीआई को सरकारी तोता कहा था, जिसे भाजपा ने जमकर भुनाया भी… अब सीबीआई की हो रही छिछालेदारी पर बड़ी बेशर्मी से कहा जा रहा है कि अफसरों को छुट्टी पर भेजने और तबादले का निर्णय संस्था की विश्वसनीयता बचाने के लिए जरूरी था। अब यह जेटली जी बताएं कि साढ़े 4 साल में उनकी सरकार ने सीबीआई को कितना साफ-सुथरा और स्वतंत्र बना दिया..? इन हालातों पर तो ये शेर सटीक बैठता है।

ये बंद कराने आए थे तवायफों के कोठे… सिक्कों की खनक देखकर खुद ही मुजरा कर बैठे… !

वरिष्ठ पत्रकार राजेश ज्वेल की कलम से

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