ए बी रोड की शॉप दर्जी की अनोखी कहानी पढ़िए, लक्ष्मण पार्वती पटेल की कलम से

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हज़ारों कोट ,शर्ट , पेंट बना दिये पर आज तक एक कपड़ा भी कांटा नहीं मैंने , सुन कर चौका तो मुह से निकल गया फ़िर आप दर्ज़ी कैसे हुए शेख़ साहब .अरे मेरा नाम तो नरेंद्र कालिया है पंजाबी आदमी हूँ , सर ।
तो दर्ज़ी शेख़ क्यो लिखा है ?

भाई सन 80 से काम कर रहा हू एक दोस्त ने दर्ज़ी नाम पसंद किया ओर फ़ोटो में दो हाथ मिलाते हुए लोगों( logo) लगा दिया जिसे हम हैंड “शेक” वाला कहते है . पर शेक कि जगह शेख़ लिखा गया ग़लती से सब बिलों से लेकर बोर्ड़ में भी . तब से शेख़ लिखा रह गया , जो चल रहा है आज भी.

मन मैं सोचा सुबह मेरे बड़े भाई भी इसीलिये भाईजान बोल रहे थे उन्हें शेख़ जानकर . पर उनसे मिलकर जाने के बाद दिन भर उनका सरल व्यक्तित्व उनके लफ़्ज़ों को स्मृति से जाने हि नही दे रहा था . इसलिये शाम को घर जाते जाते उन्हें कोट के बटन देने के बहाने उनकि दुकान पर फ़िर पहुँच गया …ख़ुद ब खुद ..

मैंने कहा आप इतना मीठा बोलते है ओर बिना बनावट के की मन किया कि आपके बारे में जाने कुछ क्योंकि सुबह आपने कहा कि आप रुके तो अपने हाथ कि चाय पिलाता हूँ अभी डॉ साहब ओर हमारा चाय बनाने का टाइम हो गया तो वो क्या है ?
दर्ज़ी जी मुस्कुराए बोले हम सालों से दूध , पत्ती ,सामान लाकर रखे है दोनो पड़ोसी . सुबह शाम हम ओर पड़ोसी डॉ गजेंद्र जैन सर दोनों साथ हि चाय पीते है.आपको भी पिलाते है अलग जायके वाली मोहब्बत से भरी हमारी चाय . सुन कर आश्चर्य हुआ इस जमाने मे पड़ोसी दुकानदार में इतना मोहब्बतनामा…

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अब उनके बारे में ओर भी जानने की उत्कंठा में बोला अच्छा आपके बारे में कुछ कहिए ना कि आप कैसे इस पेशे में ? देखिये ज़नाब मेरे पिताज़ी महू मिल्ट्री केंट में कपड़ो कि सिलाई के कांट्रेक्टर थे बस लग गई नाप लेने की लत.पहले मैं रेमंड्स में सेल्समेन था आज भी कोटा , इंदौर , उज्जैन जैसे कितनी जगहों पर सेठ , ग्राहक याद करते है कि आपसे कोई ग्राहक छूट जाए मुमकिन नही , क्योंकि मेरी बोलचाल में ही अपना बनाने का हूनर है सब बोलते है .

ठिक बोलते है मैंने भी सुर मिलाया, हम ख़ुद इसके साक्षी जो है . वो सुन मुस्कराए..उनका यह अंदाज़ बहुत मासूम हैं .
दर्ज़ी बोले मेरा नाप परफेक्ट है इसलिए कपड़े बिल्कुल फिटिंग वाले होते है.दैनिक भास्कर , नईदुनिया के मालिक तक बुलवा कर सिलवाते थे कपड़े मुझसे ही. काटना , सिलना मेरे पुराने साथियों के जिम्मे होता है. पर पहले तो 12-12 कारीगर काम करते थे , अब केवल तीन है . इस दुकान पर कपड़े भी बेचे मैंने , पर कमाई कम ब्याज ज्यादा भरने से फायदा नही होता था . ख़ुद कि तो कोई पूँजी नही थी . इधर रेडिमेड कपड़ों ने दर्ज़ी पर बड़ी मार कि है. हालांकि मुझे अब काम की जरूरत नही बेटा बड़ा लायक है. अमेरिका में है , बिना बोले कितना अकाउंट में डाल हि देता है ,सारा कर्ज़ उसने पाट दिया हमारा .पर इंसान काम करता रहे वो बेटर है इसलिए जितना काम करता हूँ दिल से ओर ईमानदारी से करता हूँ . उनके लफ़्ज़ों में ओर चहरे पर गहरी संतुष्टि दिखी तब .

दर्ज़ी सर बोले पिता का कुछ नही था मेरे पास सब दोस्तों , पत्नी मीना के पुण्यों कि वज़ह से हो गया सब कुछ ज़िन्दगी में .
मैं उन्हें बड़े मन से सुनता जा रहा था शायद इस वज़ह से वो भी यादों की दुनिया से गहरे मोती निकाल निकाल कर पेश कर रहे थे . आगे बोले मेरी शादी की भी बड़ी अच्छी दास्तान है सर , मुझे जो लड़की दिखाई वो लंदन में रहती थी पर पसंद आ गई उसकी मौसी कि बेटी ये मीना जी .
रोका होना था लन्दनवाली से पर जब मैंने कहा मुझे तो यह पसंद है तब उन्होंने कहा इसे तो बचपन से डियाबिटीज़ है . तब चौका एक बार जरूर . पड़ोसी डॉ साहब को बताया तो उन्होंने कहा हा कर दे कुछ नही होता हम है ना सब ठिक कर देंगे , फ़िर कितना नेक काम है उसमें उस लड़की का क्या दोष . बस हा कर दी साहब .

तब तक मेरी नज़रों में नरेंद्र कालिया जी जे लिए गहरी श्रद्धा , सन्मान ने जगह ले ली . शुगर कि बीमारी का पता होने के बाद भी शादी करना कितनी बड़ी बात है .कभी इंदौर आये तो ए.बी.रोड दैनिकभास्कर के सामने दर्ज़ी टैलर पर जरूर एक बार जाइयेगा सिर्फ़ ये देखने की एक 64 वर्षीय दमकता इंसान जब बात करता है तब कितना ईमानदार होकर दिव्यता का एहसास करवाता है सुनने वालों को . गज़ब का सादगी से भरपूर उनका मीठा लगने वाला व्यक्तित्व है जो किसी भी अनजान इंसान को आकर्षित करता है , शायद सच , ईमानदारी , नेकनीयती ओर परिश्रम का मिश्रण इसकी बड़ी वजह लगती है .

वो कभी कर्ज़े , गरीबी ,परेशानियों के आने कि बात करते करते अपनी पत्नी के साथ , डॉ साहब कि मित्रता को इतना मान देने लगते है यह कहते हुए की डॉ साहब में तो मेरी जान बचाई ओर हमारा पल पल साथ दिया.ईश्वर ऐसे पड़ोसी सबको दे . उनके वाक्यों से हमे स्वतः ज्ञान मिलता हैं कि हम जिनसे जब भी जो जो पाते है उसे दिल से स्वीकारे , मानें उनका वक्त पर गुणगान करे ताकी यह अच्छाई आगे बड़े .
मैंने कहा माफ़ करियेगा आपका बेटा सच मे इतना लायक है या पिता होने के नाते आप यू हि तारीफ कर रहे है क्योंकि विदेश जाकर बेटे बदल जाते है , देखा है अक्सर.तब उन्होंने मोबाइल खोल कर बेटे , बहू , परिवार का फ़ोटो दिखाया बोले नही मेरे बेटे को मेरी पत्नी ने पढ़ाया , लिखाया , गहरे संस्कार दिए . मै उसे सुबह उठाता , रनिंग करवाता . उसे जो जरूरत होती वो तब ही दिलवाते जब वो उसके लायक होता . गाड़ी दिलवाई पर पहले लाइसेंस बनवाया , मोबाइल सादा दिलवाया कहा बेटा पढ़ाई पहले . घर समय पर आना ही है . हमने कभी होटलिंग नही की वक्त कि जरूरत भी थी शायद तब . पंजाबी है तो पत्नी इतना स्वादिष्ट राजमा , छोले भटूरे या कितना कुछ मस्त बनाती है की अरे जो चाहिए घर मे हि खाओ ना बेटे से कहते थे .

उनकी बातों में बेटे के संस्कारी होने का विश्वास था और पत्नी के सेवाओं , त्याग , स्नेह का गहरा प्रेम था लफ़्ज़ों में . वो बोले पूरा जींवन ईमानदारी और मेहनत से निकाला है.भगवान ने कितनी कृपा कि है की सब सुख है .दुकान से घर और केवल मीना की देखभाल हि ज़ीवन का अब उदेश्य है क्योकि अब उसको दिखता भी कम है ज़िन्दगी भर हमारे लिए उसने इतना किया कि लगता है हमने तो कुछ नही किया उसके लिये.

उनके इस भाव मे कितना परमसुख था , अनुभव ज़िन्दगी के सार का , साथ का जो उन्हें सुनते रहना सुकून दे रहा था . इस फिलासफी से सब अगर विवाहित जींवन जिये तो एक भी घर मे गृह कलह न् हो ये समझ आया. उन्होंने जाते जाते कहा मेरे पास संतुष्ट , अच्छे ग्राहकों की आज भी कमी नही सर , क्योंकि सब मुझसे , मेरे काम से मोहब्बत से जुड़े होते है तब ईश्वर से कहता हूँ की ऒर क्या चाहिये मुझे इससे ज्यादा , शुक्रिया तेरा मालिक ..

दर्ज़ी (शेख़ ) ने बिना एक भी इंच काटे कपडे को ज़िन्दगी को कितना खूबसूरत बना रखा था अपने सौम्य , सरल , विशाल व्यक्तित्व से जिससे कितना गहरा सबक मिला यू हि नाप देते देते आज मुझ नोसखिये को भी …
लगता है , अब से किसी भी कैंची चलाते हुए दर्ज़ी के लिये मेरे मन मे ओर भी एहसास गहरा हो जाएगा ….क्योंकि इस दर्ज़ी सर में तो किसी भी ज्ञानी , संत से भी गहरी तेजस्विता दिखी भाल पर , भावों में … जो अब भी विस्मृत नहीं हो रहीं विचारों से .

— लक्ष्मण पार्वती पटेल

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