रामलला को मिला विवादित जमीन का स्वामित्व, लेकिन केंद्र के पास ही रहेगा कब्जा

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ayodhya

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को अयोध्या में श्री रामजन्मभूमि विवाद मामले में शनिवार को अपना फैसला सुना दिया है। जिसके तहत विवादित जमीन को रामलला को सौंपी गई है। साथ ही मुस्लिमों को मस्जिद बनाने के लिए पांच एकड़ जमीन देने की बात कही है। कोर्ट ने 5-0 के सर्वमत से फैसला देते हुए केन्द्र सरकार को राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट का गठन करने का आदेश भी दिया है।

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने कहा है कि कुछ शर्तों के साथ हिंदुओं जमीन सौंपी जाएगी। साथ ही कोर्ट ने केन्द्र सरकार को मस्जिद बनाने के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ जमीन उपल्बध कराने का भी आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की माने तो ये जमीन उत्तर प्रदेश के किसी प्रमुख स्थान पर अथवा 1993 में विवादित भूमि के चारों ओर की अधिग्रहित 67 एकड़ जमीन पर दी जा सकती है। शीर्ष अदालत का कहना है कि वक्फ बोर्ड को ये जमीन अवैध तरीके से बाबरी मस्जिद तोड़ने के ‘बदले‘ में दी जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने विवादित भूमि को रामलला को सौंपते हुए कहा कि बहुत से हिंदूओं का मानना है कि यहां पर भगवान राम का जन्म हुआ था, उस जमीन पर मंदिर निर्माण के लिए तीन महीने के भीतर ट्रस्ट का गठन होना चाहिए। साथ ही साथ मस्जिद बनाने के लिए जमीन भी आवंटित की जानी चाहिए। कोर्ट ने अपने 1,045 पन्नों के फैसले कहा है, ‘हिंदुओं का विश्वास कि भगवान राम का जन्म विध्वंस किए गए ढांचे में हुआ था, यह गैर-विवादित है।‘

बता दे कि भले ही कोर्ट ने विवादित जमीन को रामलला को सौंप दी है। लेकिन फिलहाल इस पर कब्जा केंद्र सरकार के रिसीवर के पास ही रहेगा। कोर्ट ने फैसले में कहा है कि हम इस बात को स्वीकार करते हैं कि एक ट्रस्ट अथवा कोई दूसरा उपयुक्त तंत्र बनाने के लिए केन्द्र सरकार को आदेश देना जरूरी है, जिसे जमीन को सौंपा जा सके।

उच्चतम न्यायालय का कहना है कि सरकार को इसको लेकर योजना बनानी चाहिए। साथ ही इस ट्रस्ट या बॉडी के मैनेजमेंट से संबंधित मामलों और इसके कामकाज के लिए भी प्रावधान बनाने चाहिए।इसके अलावा ये भी तय होना चाहिए कि ट्रस्टियों के पास मंदिर के निर्माण और अन्य आवश्यक, आकस्मिक और पूरक मुद्दों से निपटने के लिए कितनी शक्तियां होनी चाहिए।

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