‘रमा-एकादशी’ व्रत से पाईए कामधेनु समान पुण्य फल

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महालक्ष्मी के रमा स्वरूप के साथ-साथ भगवान विष्णु के पूर्णावतार केशव स्वरुप के पूजन ‘रमा एकादशी’ पर किया जाता है . इस एकादशी व्रत के प्रभाव से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। यह चातुर्मास की अंतिम एकादशी है।

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दशमी के दिन सूर्यास्त के बाद भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए। वैसे एकादशी व्रत के नियमों का पालन दशमी के दिन से ही शुरू हो जाता हैं। एकादशी पर किए जाने वाले पूजा का विधि इस प्रकार है .

1.इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। सुबह जल्दी उठाकर स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए . पूरे दिनभर माता के लक्ष्मी स्वरुप का स्मरण करना चाहिए .

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2. भगवान विष्णु को धूप, दीप, सेब पूजन कर तुलसी के पत्तों, नैवेद्य, फूल, फल, नैवेद्य,आदि का भोग लगाना चाहिए।

3. भगवान विष्णु का रात्रि में भजन-कीर्तन या कथा पारायण कर जागरण करना चाहिए।

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4. एकादशी के अगले दिन द्वादशी पर पूजन के बाद जरुरतमंद व्यक्ति या ब्राह्मण को भोजन और दान-दक्षिणा देकर, जब ये सब हो जाए भोजन करके व्रत खोलना चाहिए।

पद्म पुराण में उल्लेखित हरएक एकादशी का अपना एक ‘महत्व’ होता है. वर्णन के अनुसार रमा एकादशी व्रत कामधेनु और चिंतामणि के समान फल देता है। इस व्रत से सभी पाप कर्मों का नाश होता है और उसे पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

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इस रमा एकादशी की कथा इस प्रकार है- प्राचीनकाल में विंध्य पर्वत पर क्रोधन नामक एक महाक्रूर बहेलिया रहता था। उसने अपनी सारी जिंदगी, हिंसा,लूट-पाट, मद्यपान और झूठे भाषणों में व्यतीत कर दी। जब उसके जीवन का अंतिम समय आया तब यमराज ने अपने दूतों को क्रोधन को लाने की आज्ञा दी। यमदूतों ने उसे बता दिया कि कल तेरा अंतिम दिन है। मृत्यु भय से भयभीत वह बहेलिया महर्षि अंगिरा की शरण में उनके आश्रम पहुंचा। महर्षि ने दया दिखाकर उससे पापाकुंशा एकादशी का व्रत करने को कहा। इस प्रकार पापाकुंशा एकादशी का व्रत-पूजन करने से क्रूर बहेलिया को भगवान की कृपा से मोक्ष की प्राप्ति हो गई।

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