सरकार और विहिप की मजबूरी में उलझा राम मंदिर

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Justice VS Kokje  
कीर्ति राणा 
मोदी सरकार से लेकर संघ विहिप आदि चाहते हैं कि राम मंदिर निर्माण जल्द से जल्द शुरु हो जाए लेकिन मजबूरी के कारण निर्माण अटका हुआ है। कुछ मजबूरी मोदी सरकार की और सरकार की मजबूरी पर निर्भर रहना विहिप की मजबूरी-इन मजबूरियाँ में उलझा हुआ है मंदिर निर्माण।
विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष जस्टिस वीएस कोकजे ने खुलासा किया है कि राम मंदिर मामले में कानून नहीं बना पाना सरकार की मजबूरी है। इस मजबूरी को मैं अच्छी तरह से समझता हूँ क्योंकि मैं खुद न्याय जगत से जुड़ा रहा हूँ।जहां तक इस मामले में विहिप का सवाल है तो उसकी भी मजबूरी है भाजपा और सरकार पर निर्भर रहना।
क्योंकि एक मात्र भाजपा ही इस मामले में विहिप का साथ दे रही है। 2014 में मोदी सरकार राम मंदिर मुद्दे पर ही सरकार में आई तब से अब तक साढ़े चार साल में कुछ हो सकता था लेकिन तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा ने मंदिर मामले वाले प्रकरण में सजगता नहीं दिखाई।कोर्ट की नजर में यह संपत्ति ( जमीन) विवाद का मामला है लेकिन यह करोडों हिंदुओं की आस्था से जुड़ा मुद्दा है और जहां आस्था हो वहां कानून नहीं चलता, सबरीमला मंदिर मामले में कोर्ट के फैसले पर आस्था भारी पड़ी है।
जस्टिस वीएस कोकजे ‘राम मंदिर कब, कहाँ, कैसे’ विषय पर एसपीसी (स्टेट प्रेस क्लब) द्वारा आयोजित परिसंवाद में मुख्य वक्ता के रूप में बोल रहे थे।राम जन्म भूमि का जो महत्व है इसलिए मंदिर उसी स्थान पर बनेगा भले ही कितना भी वक्त लगे। मंदिर तो एक तरह से बन चुका है क्योंकि  गर्भगृह तो वही है बस उस जगह भव्य मंदिर बनना है।
मंदिर मुद्दे के तीन हल हैं न्यायालय फैसला दे, संबंधित पक्षों में समझौता हो जाए या कोर्ट का  फैसला विपरीत आए तो सरकार कानून बनाए।सरकार कानून बना भी दे तो उसे कोर्ट में चुनौती देने वाले उन पक्षों की कमी नहीं है जो अभी भी मंदिर निर्माण मामले में अड़ंगे लगा रहे हैं।कानून को कोर्ट में चुनौती देने का मतलब है नए सिरे से एबीसीडी करना। सरकार ये सारी दिक़्क़तें हमें बता चुकी है इसलिए हम भी कोर्ट की सुनवाई के इंतजार के अलावा कुछ नहीं कर सकते। अभी 31 जनवरी को कुंभ में शीर्ष संतों के साथ विहिप की दो दिनी बैठक है, उसमें संत समाज का  निर्णय क्या रहेगा इस पर अगला कदम तय होगा।
मंदिर मामले की सुनवाई के लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा पांच सदस्यीय बैंच गठित किए जाने पर जस्टिस कोकजे का कहना था यह बैंच सुनवाई शुरु कर देती है तो इसी साल नवंबर तक मंदिर मामले में विशेष बैंच को फैसला सुनाना ही होगा क्योंकि सीजेआई रिटायर होने वाले है। राम मंदिर के पक्ष में फैसला आता है तो भव्य मंदिर निर्माण का काम शुरु हो जाएगा, गर्भगृह तो वही है। यदि फैसला विपरीत आता है तो सरकार को कानून बनाकर, अध्यादेश लाकर मंदिर निर्माण करना होगा।सरकार कानून बनाने के खिलाफ नहीं है कोर्ट का निर्णय पक्ष में नहीं आया तो कानून बनेगा।आस्था के सवाल पर न्यायालय की दख़लंदाज़ी नहीं हो सकती।
करोडोँ हिंदुओं की आस्था से जुड़े मंदिर जन्मभूमि मामले में कोई न्यायालय फैसला नहीं कर सकता-आस्था के चलते न्यायालय को प्रमाण की आवश्यकता नहीं।वैसे भी फ़ैज़ाबाद से मामला स्थानांतरित होने के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसले में सिद्ध किया है जो ढाँचा तोड़ा उसके नीचे मंदिर था।मुस्लिम जज ने भी माना कि मंदिर का ढाँचा था नीचे।ये लड़ाई राष्ट्र के मान बिंदुओं को पुन स्थापित करने की है।दुनिया में इस्लाम ही नहीं आर्य समाज भी मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखता लेकिन वह मूर्ति तोड़ने की बात नहीं कहते। हम आस्था के लिए लड़ रहे हैं कोर्ट में चल रही लड़ाई भौतिक सँपत्ति के लिए हैं।
हमारे ही लोग जिस दिन मंदिर बनने का विरोध बन्द करेंगे, मंदिर बनने से कोई नहीं रोक सकेगा। मंदिर निर्माण के लिए पैसों, प्रयत्नों की कमी नहीं है, निर्माण चल रहा है जैसे ही भूमि का कब्जा मिलेगा दो साल में मंदिर बन जाएगा। समझौते की दिशा में यह हो सकता है कि अयोध्या के मुसलमान ने 1949 के बाद से एक बार भी वहां नमाज़ नहीं पढ़ी गई, ऐसे में मस्जिद तोड़ी गई फिर से बना दो जैसा प्रश्न उठाना ही गलत है। हम बात अयोध्या मथुरा काशी की करते रहे हैं।
देश में 30-35 हजार मस्जिदें ऐसी हैं जो मंदिरों को तोड़ कर बनाई गई। ऐसा कानून बनाया जाए कि जो धर्मस्थान जिस धर्म का हो उसे वापस दिलाया जाए। हिंदुओं ने मस्जिद,  चर्च तोड़ कर मंदिर नहीं बनाए हैं। यूँ तो सुनवाई के लिए आधीरात में न्यायालय खुल जाते हैं लेकिन राम मंदिर पर दरवाजे बंद हो जाते हैं। मुकदमा महत्वहीन था, इसकी प्राथमिकता नहीं थी तो इलाहाबाद क्यों ट्रांसफर किया गया।कोर्ट ने इसे हिंदुओं की संपत्ति तो माना लेकिन जमीन को तीन हिस्सों में बांट दिया।  न्यायालय के कारण गड़बड़ी हो रही है। कानून बनाने की बात इसलिए उठी कि भाजपा ने कहा सरकार बना दो हम मंदिर बना देंगे। हमने सरकार से कानून बनाने का आग्रह किया तो सरकार ने कहा कानून बना दिया तो उसे चैलेंज मिलेगा, इस मजबूरी के चलते हम इस विशेष बैंच में सुनवाई शुरु होने का इंतजार कर रहे हैं।

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