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जब मैंने राजेंद्र माथुर को अपनी पीएचडी के लिए को गाइड बनने के लिए राजी किया, वरिष्ठ पत्रकार अर्जुन राठौर की टिप्पणी

Posted on: 05 May 2018 10:24 by Ravindra Singh Rana
जब मैंने राजेंद्र माथुर को अपनी पीएचडी के लिए को गाइड बनने के लिए राजी किया, वरिष्ठ पत्रकार अर्जुन राठौर की टिप्पणी

बात उन दिनों की है जब राजेंद्र माथुरजी नईदुनिया छोड़कर नवभारत टाइम्स के संपादक बने थे। उन दिनों इंदौर विश्वविद्यालय के कुलपति थे डॉक्टर दासगुप्ता , मैं उनसे मिला और यह इच्छा जाहिर की कि मैं हिंदी की खोजी पत्रकारिता में पीएचडी करना चाहता हूं और उसमें गाइड के रूप में मैं राजेंद्र माथुर जी को लेना चाहता हूं।

तब दासगुप्ता जी ने कहा कि राजेंद्र माथुर जी आपके गाइड तो नहीं बन पाएंगे लेकिन अगर वह को – गाइड बन जाते हैं तो यह आपके लिए बहुत बड़ी बात होगी । डॉ राजेंद्र मिश्रजी को मैंने अपना गाइड बनने के लिए राजी किया था और मैं राजेंद्र माथुर जी से मिला और मैंने उन्हें कहा कि मैं उन्हें को गाइड बनाना चाहता हूं खोजी पत्रकारिता में पीएचडी के लिए।

उन्होंने कुछ सवाल मुझसे किए और कहा कि ठीक है तुम औपचारिकता पूरी करो । मै उनसे दिल्ली में मिला और मैंने उनसे कहा कि मेरा पत्रकारिता में पीएचडी के लिए रजिस्ट्रेशन हो गया है और उनकी लिखित सहमति भी वहां पर मैंने दे दी है। तब उन्होंने मुझे कहा कि मैं कुछ कुछ समय के अंतराल से उनसे मिल लिया करूँ , उन्हें जब भी समय मिलेगा वे मेरी पीएचडी के लिए कुछ और सुझाव भी देंगे।

यह सिलसिला चलता रहा । इसी बीच राजेंद्र माथुर जी ने मुझे यह सुझाव दिया कि अगर तुम खोजी पत्रकारिता पर पीएचडी करना चाहते हो तो विदेशों में खोजी पत्रकारिता कहां से शुरू हुई इस पर भी कुछ शोध इसमें शामिल होना चाहिए तब मैं उस समय के मुख्यमंत्री श्री मोतीलाल वोरा से निजी रूप से मिला और मैंने उन्हें एक प्रस्ताव दिया कि मुझे मध्यप्रदेश शासन से आर्थिक सहयोग दिलाया जाए ताकि मैं लंदन जाकर शोध कर सकूँ। उन्होंने एक प्रस्ताव बनवाकर उस समय के जनसंपर्क आयुक्त श्री एल के जोशी के पास भेज दिया।

जोशी जी से जब मैं मिला तो उन्होंने कहा कि हमारे जनसंपर्क विभाग में इस तरह का कोई प्रावधान नहीं है कि किसी पत्रकार को पीएचडी करने के लिए कोई धनराशि दी जाए । लेकिन मुख्यमंत्री जी ने कहा है तो मैं कुछ रास्ता निकालता हूं मेरी पीएचडी का कुछ काम शुरु हुआ ही था कि अचानक से राजेंद्र माथुर जी का निधन हो गया उनके निधन के बाद मेरी PHD भी अधूरी रह गई और कोई काम उसके बाद उसे लेकर नहीं हो पाया।

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