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राजस्थान के रण में खिंची तलवारें

Posted on: 04 Dec 2018 10:33 by Pawan Yadav
राजस्थान के रण में खिंची तलवारें

मुकेश तिवारी
([email protected])

जब एक दल अपनी सत्ता को बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक दे और दूसरा सत्ता छीन लेने के लिए तो मुकाबला कड़ा हो ही जाता है। ऐसा ही नजारा राजस्थान के चुनावी रण में दिखाई देने लगा है। जो भाजपा-कांग्रेस और उनके नेता अब तक एक-दूसरे पर जमकर शब्द बाण छोड़ रहे थे वह मानो तलवार खींचने की मुद्रा में आ गए हैं। राजस्थान ने इससे पहले भी अपने रण में कई रोचक, बड़े और कड़े चुनावी मुकाबले देखे पर इस बार यहां चुनाव प्रचार के दौरान भाषा का स्तर जितना गिर गया उतना पहले कभी नहीं गिरा था। राष्ट्रीय स्तर के नेताओं ने भाषा के स्तर को खूब गिराया तो चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों और उनके समर्थकों का तो कहना ही क्या। राजस्थान की राजनीति को बहुत नजदीक से जानने और समझने वाले जयपुर निवासी एक वरिष्ठ पत्रकार से जब मेरी फोन पर बात हुई तो वह बताने लगे कि भाषा की मर्यादा के लिहाज से इतना घटिया चुनाव प्रचार अभियान उन्होंने अपने लंबे करियर में पहले कभी नहीं देखा।

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राजस्थान के मतदाता का यह स्वभाव रहा है कि वह हर पांच साल में सत्ता की चाबी दूसरी पार्टी के हाथ में सौंप देता है। इसलिए वहां पांच साल भाजपा तो अगले पांच साल कांग्रेस का राज पिछले कुछ दशकों से रहता आया है। भाजपा इस परंपरा को 2018 के सत्ता के सेमीफाइनल में तोड़ देने को अतुर है तो कांग्रेस का प्रयास है कि यह परंपरा बनी रहे और इस बार सत्ता की चाबी उसके पास आ जाए। शुरुआती दौर में ऐसा माना जा रहा था कि कांग्रेस बड़ी आसानी से इस बार राजस्थान के चुनावी रण से विजेता बनकर उभरेगी। तमाम रिपोर्ट्स और सर्वे भी इसी पक्ष में थे। टिकट वितरण के बाद और चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में भारतीय जनता पार्टी ने यहां पूरी ताकत झोंक दी है। इससे मुकाबला अब एकदम एकतरफा नहीं बचा है और रोमांचक हो चला है। हालांकि कांग्रेस के बड़े से लेकर स्थानीय नेता तक अभी यह दावा कर रहे हैं कि राजस्थान में वह बहुत आसान जीत दर्ज करने जा रहे हैं। भाजपा नेताओं का दावा इसके ठीक विपरीत है।

vasundhara raje and sachin pilot

200 विधानसभा सीटों वाले राजस्थान में जब चुनाव प्रचार अभियान शुरू हुआ तो कमान स्थानीय भाजपा नेतृत्व के पास थी। जैसे-जैसे अभियान आगे बढ़ा और भाजपा के आला नेतृत्व को यह महसूस होने लगा कि अगर राजस्थान दोबारा जीतना है तो सारे सूत्र अपने हाथ लेने होंगे। इसके बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने तमाम सूत्र अपने हाथ ले लिए और मध्य प्रदेश का चुनाव निपटने के बाद तो पूरा फोकस ही राजस्थान पर कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलावा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की कई सभाएं, रैली और रोड शो हुए। जातीय समीकरणों को देख कर कई दूसरे नेताओं की भी सभाएं कराई गईं। मध्यप्रदेश की तरह ही राजस्थान में भी प्रचार अभियान के आखिरी दौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूरी तरह भाजपा की मदद के लिए मैदान में उतर आया। वहीं कांग्रेस ने भी चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में यहां पूरा जोर और ध्यान लगाया। राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी सहित कई बड़े नेताओं की सभाएं और रोड शो हुए। कल 5 दिसंबर की शाम 5 बजे राजस्थान में चुनाव प्रचार थम जाएगा। 7 दिसंबर को यहां पौने पांच करोड़ से ज्यादा मतदाता नई सरकार चुनेंगे। फैसला 11 दिसंबर को आने वाला है। फिर कहना पड़ेगा कि राजस्थान के रण में इस बार जैसा चुनावी मुकाबला हुआ वैसा पहले कभी नहीं देखा गया। राष्ट्रीय मुद्दों पर, भाषा की मर्यादा छोड़कर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाकर राजनीतिक दल और उनके नेताओं ने चुनाव को इस कदर मोड़ा कि ज्यादातर स्थानीय मुद्दे गौण ही हो गए।

लेखक घमासान डॉट कॉम के संपादक हैं।

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