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प्रयागराज की बहती गंगा में होगा दलबदलुओं का शुद्धिकरण | Purification of Defectors will be done in Ganga – Prayagraj

Posted on: 14 May 2019 18:36 by Surbhi Bhawsar
प्रयागराज की बहती गंगा में होगा दलबदलुओं का शुद्धिकरण | Purification of Defectors will be done in Ganga – Prayagraj

बीते चुनाव तक इलाहाबाद के नाम से पहचाना जाने वाला गंगा-जमना के संगम पर बसा कुंभ नगर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रताप से प्रयागराज कहलाने लगा। भले ही नाम परिवर्तन से न तो लोकाचार सुधरा, न शहर की समस्याएं हल हुई और न ही भ्रष्टाचार को शिष्टाचार में तब्दील कर देने वाली सियासत ही पवित्र हो पाई। अलबत्ता हालात और बिगड़े ही हैं। इसका प्रमाण है तीनों प्रमुख प्रत्याशी दलबदलु हैं। चुनाव के पहले तक किसी और दल में थे, आज किसी और दल में। अब इन दलबदलुओं में से किसके पाप चुनावी विजयश्री का वरण कर धूलेंगे यह संगम से बहता पानी ही बता सकता है।

यहां की सितारा प्रत्याशी हैं रीता बहुगुणा जोशी। मोहतरमा कभी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हुआ करती थी। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले दल बदला और भाजपा विधायक बनकर काबिना मंत्री भी बनीं। अब भाजपा के टिकट पर लोकसभा में जाना चाहती हैं। इतना पाने के बाद उन्हें लगने लगा है कि कांग्रेस पार्टी का अब कोई अस्तित्व ही नहीं रह गया है। वैसे मोहतरमा कांग्रेस में भी समाजवादी पार्टी से पहुंची थी।

दलबदल की इससे भी मजेदार कथा जुड़़ी है कांग्रेस उम्मीदवार योगेश शुक्ला से। उन्हें तो दो मिनट नुडल्स की तरह भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आते ही टिकट मिल गया। सपा-बसपा गठबंधन से चुनाव मैदान में उतरे राजेंद्र सिंह पटेल भी भाजपा से ही आए हैं। उनके करीबी रिश्तेदार प्रवीण पटेल अभी भी भाजपा विधायक हैं। यानी भाजपा उम्मीदवार भी आयातित और बाकी दो उम्मीदवार भी भाजपाई पृष्ठभूमि से। तीनों को आसरा भाजपा या संघ कैडर से ही, क्योंकि कहीं न कहीं सियासती मित्रता उसी दल में तीनों की है। तीनों की उम्मीदवारी के पीछे जातिगत समीकरण के साथ ही आर्थिक समृद्धि भी भारी भरकम कारण है। आज के दौर में सामान्य या समर्पित कार्यकर्ता को टिकट मिलने की बात केवल भाषणों में ही उच्चारित होती है। हकीकत में नहीं।

अब पार्टियों की इस पसंद में से मतदाता किसे पसंद करते हैं इसका फैसला तो वे करेंगे ही। इतना तय है कि उसे भी तीन में से एक चुनना ही होगा। कारण, अभी भारतीय मतदाता इतना परिपक्व नहीं हुआ कि वह नोटा (इनमें से कोई नहीं) का बटन दबाए और सभी को खारिज कर दे। कभी जाति तो कभी पार्टी तो कभी किसी और भावुक कारण के चलते वह मत तो दे ही देता है। उसके इसी मत से कई भारी बहुमत वाली सरकारें भी ढही हैं और कई दिग्गज घर बैठे हैं।

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