बेबाक, बेधड़क और बेतकल्लुफ हैं पुण्य प्रसून

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puny prasun vajpayee

इंदौर, प्रदीप जोशी। गरीब मुल्क में चुनावी दौर के महज 22 दिन में अरबों रुपए खर्च हो जाएंगे। यह राशि सियासी पार्टियां खर्च करेंगी जो जनता के मूल मुद्दों से ध्यान भटका कर ऐसे मुद्दों पर बहस खड़ी करवाएंगे जिनका जनता से कोई सरोकार नहीं होगा। जनता को समझना होगा की लोकतंत्र में उनका वोट ही सबसे बड़ा हथियार है। दुख इस बात का होता है कि जनता सत्ता में बैठे लोगों से सवाल नहीं करती। यह दर्द देश के ख्यात पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी का है। इंदौर प्रेस क्लब के स्थापना दिवस के मौके पर आयोजित समारोह में भाग लेने इंदौर आए वाजपेयी ने खुल कर अपने दिल के उदगार व्यक्त किए। समारोह से अलग निजी तौर पर भी राजनैतिक दलों के प्रति उनका नजरिया और वर्तमान व्यवस्था को लेकर उनकी पीड़ा सामने आती रही। तमाम साजिशों का शिकार इन दिनों बन रहे इस पत्रकार का एक अलग रूप भी नजर आया जो बेबाक है, बेधड़क और बेतकल्लुफ सा है।

एक पत्रकार की पहचान उसका अपना बैनर होता है जिनके जरिए उसे प्रसिध्दि मिलती है। प्रसून जी का व्यक्तित्व और कृतित्व ऐसे बैनरों से काफी उपर है यह मुझे कल पता चल गया। सब जानते है कि इन दिनों वे सत्ताधारियों के निशाने पर है और फिलहाल न्यूज चेनल पर दिखाई नहीं दे रहे। एबीपी न्यूज में मास्टर स्ट्रोक से सत्ताधारियों की बखिया उधेड़ने वाले खांटी पत्रकार को नेताओं से मिलना जुलना ज्यादा पसंद नहीं। पत्रकारिता के विद्यार्थियों से संवाद की बाद जब कही तो झट मान गए। थोड़ा बहुत नहीं पूरे दो घंटे स्कूल आॅफ जर्नलिजम में भावी पत्रकारों के बीच बतियाते रहे। कुछ यही अंदाज उनका जनता के बीच भी देखा जब प्रेस क्लब के व्याख्यान में उन्होंने मजबूती के साथ सरकार की खामियों को सिलसिलेवार उजागर कर दिया।

इंदौर आए और सराफा ना जाए ऐसा तो हो नहीं सकता था। मंगलवार रात में सराफा की भीड़ देख वे हैरान हो गए। वर्किंग डे में इतनी भीड़ तो शनिवार – रविवार में क्या हाल होता होगा यह उनकी हैरानी का कारण था।

बहरहाल दही बड़ा, भुट्टे का कीस, छोले टिकिया के स्वाद के तो वे कायल हो गए। बस इससे ज्यादा पेट में जगह नहीं थी पर इंदौर के खास व्यंजनों जिनका वह जिक्र कर रहे थे वह आयटम तो उन्होंने चखे ही नहीं थे। मसलन जलेबी, गराडू, कचोरी, खट्टा समोसा आदि। बहरहाल भेरूनाथ की रबड़ी के लिए पेट में थोड़ी जगह बन गई। अरविंद तिवारी जी के बहुत आग्रह पर उन्होंने अग्रवाल की आईसक्रीम का स्वाद लिया और हाथ जोड़ लिए। पान के बगैर सराफा का सफर भला कहा पूरा होता हैं पैदल ही हम सब अन्ना भैया की दुकान की और बढ़ गए उनका पसंदिदा मघई तो मिला नहीं लिहाजा बनारसी पान की एक गिलोरी उन्होंने मूंह में दबाई तो चेहरे पर इंदौरियों से भाव प्रकट हो गए। अन्ना भैया की दुकान पर भी उनके साथ फोटों खिचवाने वालों की भीड़ लग गई। इससे पहले यही हाल सराफा में भी बन गया था।

सराफा में लोग उन्हें देखते चहक उठे। पहले तो लोग आसपास जमा हो गए फिर धीरे से सेल्फी की इजाजत मांगने लगे। कुछ दुकानदार दुकान छोड़ कर व्यंजनों को चखने का आग्रह भी करते रहे। सहज सरल मुस्कान के साथ वे सभी से मिलते रहे फोटों भी खूब खिचवाएं।

इंदौर आने का प्रोग्राम हो तो भगवान महाकालेश्वर के दर्शन का लाभ तो हर कोई उठाता ही है। प्रसून जी ने बताया कि पिछले तीन साल से आना टल रहा था महाकाल की इच्छा होगी इसीलिए कार्यक्रम बन गया। सुबह खजराना गणेश के दर्शन कर हम सभी उज्जैन रवाना हो गए।

श्रध्दापूर्वक दर्शन पूजन के बाद मंदिर के प्रशासनिक दफ्तर में कुछ देर बैठे। इस दौरान विक्रम युनिवर्सिटी में संस्कृत विभाग के प्रमुख पंडित राजेश्वर शास्त्री ने प्रसून जी को आर्शिवाद स्वरूप अंग वस्त्र औढ़ा कर स्वस्तिवाचन किया। डॉ शास्त्री ने कहा आपका नाम से पुण्य जुड़ा है यानी पुर्वजों का आर्शिवाद, इसीलिए तो चेत्र नवरात्रि में प्रेम और वात्सल्य की प्रतिमुर्ति स्कंद माता के पूजन के दिन आपकों महाकाल ने बुलाया है। बात सच भी है यह कोई संयोग नहीं हो सकता बहरहाल इन दो दिनों में बाते और तफरीह तो खूब हुई पर पत्रकार होने के नाते दो सीख उनसे मिली कि हाथ में कंटेंट मजबूत हो तो कोई कालर पर हाथ नहीं डाल सकता और अच्छे काम की शुरूआत के लिए कुछ बुरा भी हो जाए तो कोई बात नहीं।

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