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पीके की शरण में दीदी | Prashant Kishor’s decision to work with CM Mamata Banerjee for West Bengal…

Posted on: 07 Jun 2019 07:09 by Pawan Yadav
पीके की शरण में दीदी | Prashant Kishor’s decision to work with CM Mamata Banerjee for West Bengal…

एक पीके वह था, जो फिल्म में किसी दूसरे ग्रह से आया था। उसने सवाल उठाए और समझ के दायरे को बढ़ाने की कोशिश की। अहसास कराया कि दुनिया उतनी छोटी भी नहीं, जितनी अपनी-अपनी आंख और समझ से देख पाते हैं। एक राजनीति के पीके (प्रशांत किशोर) हैं, जो सियासत की नब्ज पर हाथ रखते हैं। अधिकतर बार वे कमाल दिखाने में कामयाब रहे हैं। 2021 के लिए दीदी ने पीके का हाथ थाम लिया है। सवाल वही है कि क्या ये पीके, दीदी की समझ का दायरा बढ़ा पाएंगे। क्योंकि इधर, कभी लाल रहा बंगाल भगवा हुआ जा रहा है, जिसकी खीज दीदी के हर कदम में महसूस की जा सकती है।

लोकसभा चुनाव के आंकड़ों के बाद दीदी का पीके की शरण में जाना स्वाभाविक ही लगता है। हालांकि भाजपा ने 2 से 14 सीटों की छलांग जरूर लगाई है, लेकिन वह तृणमूल कांग्रेस के वोटर्स को तोड़ नहीं सकी है। पिछले लोकसभा चुनाव में टीएमसी को 39 फीसदी वोट मिले थे, जो इस बार तीन फीसदी बढक़र 43.8 प्रतिशत हो गए हैं। सीटें घटी हैं, लेकिन वोटर प्रतिशत बढ़ा है। उधर, भाजपा को 2014 में 18 फीसदी वोट मिले थे, इसमें 22 फीसदी का इजाफा हुआ है और पार्टी ने इस बार बंगाल के 40.25 प्रतिशत मतदाताओं का विश्वास जीता है।

अगर टीएमसी का वोट नहीं कटा है, इसका मतलब साफ है कि भाजपा को वाम और कांग्रेस के टूटे वोटर्स का समर्थन मिला है। वाम के 40 में से 39 उम्मीदवार अपनी जमानत नहीं बचा पाए। वाम को पिछले लोकसभा चुनाव में 29 फीसदी वोट मिले थे, जो इस बार घटकर 8-9 फीसदी रह गए हैं। यही हाल कांग्रेस का है, जिसका बंगाल में वोट आधार 9 से घटकर 4 फीसदी पर सिमट गया है। हालंाकि टीएमसी का वोट भले कम नहीं हुआ है, लेकिन उसका भरोसा तो कमजोर हुआ ही है। ममता बनर्जी की बदली बॉडी लैंग्वेज ही इस बात को साबित कर रही है।

जयश्री राम के नारे पर उनकी खीज इसका सबसे बड़ा सबूत है। दरअसल हारता हुआ जुआरी हर बार बड़ा दांव लगाने की कोशिश करता है। इस उम्मीद से कि इस एक दांव से उसका पूरा पिछला हिसाब बराबर हो जाएगा। लेकिन अफसोस हर बार वह हार का गड्ढ़ा ही बड़ा करता रह जाता है। ममता की इस खीज में कुछ-कुछ ऐसी ही मानसिकता नजर आ रही है, क्योंकि यह पहला मौका नहीं है जब उन्होंने भगवा के विरोध के चक्कर में अपने आसपास बड़ी खाई खोदी है। कभी की गई तारकेश्वर डेवलपमेंट बोर्ड में मुस्लिम मंत्री बैठाने की कोशिश उसी का एक उदाहरण कही जा सकती है।

याद ही होगा कि वे दो-तीन साल पहले मुहर्रम के दिन दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर रोक लगाने का फैसला ले चुकी है, जिसे अदालत ने कड़ी टिप्पणी के साथ खारिज किया था। हालांकि दीदी इसके बाद भी नहीं मानी और प्रतिमा विसर्जन के लिए अनुमति का प्रस्ताव ले आई थी, जिसके कारण भी भारी जनाक्रोश का सामना करना पड़ा था। संघ प्रमुख मोहन भागवत और अमित शाह के दौरे, रैलियां और सभाएं वे अनुमति की आड़ में एकाधिक बार निरस्त कर ही चुकी हैं। 10 हजार मदरसों को मान्यता देने, अल्पसंख्यकों के बजट में 76 फीसदी की बढ़ोतरी करने तथा इमाम और मुअज्जिनों को वेतन देने के फैसले भी विवाद की वजह बने। वेतन का फैसला भी कोर्ट ने ही खारिज किया था।

फिर खुद ममता के तौर-तरीके भी कम नहीं है। किसी ने इंटरव्यू में सवाल पूछ लिया तो नक्सली कहकर उठ गईं, चलती बनीं। किसान ने सभा में खाद के दाम बढ़ाए जाने को कठघरे में खड़ा किया तो उसकी गिरफ्तारी का फरमान जारी कर दिया। पुलिस कमिश्नर से पूछताछ के लिए आए सीबीआई अफसरों को गिरफ्तार करने से भी गुरेज नहीं किया। कार्टून बनाने वाले, मीम में उनका इस्तेमाल कर लेने वालों पर तो उनकी कृपा लगातार ही होती रही है। कभी सलमान रश्दी को आने का मौका नहीं दिया तो कभी तस्लीमा पर पाबंदी लगा दी।

किसी ने ठीक ही कहा था कि उनका रवैया किसी बिगडै़ल जमींदार जैसा लगता है। शायद वे इस अहं को जी रही हैं कि उन्होंने वाम की इतनी लंबी और मजबूत सत्ता को उखाड़ फेंका है। वे भी केजरीवाल की तरह दिल्ली की राजनीति में दखल देने लगी थीं, जबकि बंगाल में ही असंतोष बढ़ता जा रहा था।

नेता न जाने क्यों ये भूल जाते हैं कि सत्ता परिवर्तन की वजह वे नहीं बल्कि जनता होती है। वह अपना जनमत बदलती है, तब जाकर सत्ता करवट लेती है। नेता का अहंकार फिर उसे उसी पथ पर लाकर खड़ा कर देता है, जिसकी वजह से जनता ने पुरानी सत्ता को धूल चटाई थी। बंगाल के चुनाव में अभी डेढ़-दो साल हैं, उसके लिए अभी से प्रोफेशनल रणनीतिकार की मदद लेना हाथ से फिसलती सत्ता को बनाए रखने की छटपटाहट का हिस्सा हो सकती है।

जगन को 175 में से 150 सीटें दिलाने वाले पीके दीदी की क्या मदद कर पाएंगे, वक्त ही बताएगा। तब तक यह तय है कि बंगाल की राजनीति में भी खाट पर चर्चा, यूपी के लडक़े जैसे ही सियासी ड्रामे के लिए देश को तैयार हो जाना चाहिए। मुकाबले के लिए भाजपा का इबार बांग्ला पहले से ही वहां मौजूद तो है ही है।

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