प्रणव मुखर्जी के प्रधानमंत्रीत्व में 2019 में राष्ट्रीय सरकार बन सकती है?

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प्रणव मुखर्जी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा अभी अतृप्त है। प्रधानमंत्री की कुर्सी का मोह कायम है। हो भी क्यों न? दो बार इस पद के नजदीक पहुंच चुके दादा को गांधी परिवार के कोटरी प्रबंधकों ने पटखनी दी है। अब गांधी परिवार और उनके प्रबंधक मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में कहीं प्रभावशाली नहीं हैं। अगर नरेन्द्र मोदी को हराकर जो भी नई सरकार बनती है तो कांग्रेस का प्रधानमंत्री बनना मुश्किल होगा बशर्ते पार्टी 100 सीटें न जीत जाए। तीसरे मोर्चे में शामिल क्षेत्रीय दलों में ममता बनर्जी, चंद्रबाबू नायडू, मायावती, शरद पवार, नवीन पटनायक, देवेगौड़ा या लालू यादव कोई भी तब ही दावेदार हो पायेगा जबकि 40-50 सीटें जीते। दलित होने से सबसे प्रबल दावेदार मायावती होंगी। लेकिन सीटें ला पाए तभी।

अब आते हैं असली मुद्दे पर। यह एक कड़वी सच्चाई है कि बड़े औद्योगिक घरानों की मर्जी के बगैर कोई प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। यानी अम्बानी-अडानी जिसे पर्दे के पीछे से आगे बढ़ाएंगे वही भानुमति के कुनबे का नेता होगा। हालांकि शरद पवार इस लिहाज से अकेले क्षत्रप हैं लेकिन 25 से ज्यादा सीटें उनकी भी शायद ही आये। प्रणब मुखर्जी तब डार्क हॉर्स के तौर पर उभर सकते हैं। उनको पिछले दिनों नवीन पटनायक ने अपने घर खाने पर बुलाया था औऱ उस भोज बैठक में देवेगौड़ा, आडवाणी और सीताराम येचुरी को भी बुलाया था। हालांकि वो कोई राजनीतिक मीटिंग नहीं थी लेकिन भूमिकाएं तो ऐसे ही बनती हैं।

है यह दूर की कौड़ी लेकिन प्रणव मुखर्जी के नाम पर शिवसेना, ममता बनर्जी समेत सभी राजी हो जाएंगे। यहां तक कि अरविंद केजरीवाल से भी दादा के अच्छे संबंध हैं। इन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में दादा को समर्थन दिया ही था। कांग्रेस के पास भी खुद सत्ता में न आ पाने की स्थिती में प्रणव मुखर्जी से ज्यादा अनुकूल प्रधानमंत्री कौन होगा?एक राष्ट्रीय सरकार भी बन सकती है जिसकी चर्चा सत्ता के गलियारों में अक्सर होती रहती है। यह सब कुछ इसलिए अटकलों के बाजार में सोचा जा रहा है क्योंकि नरेंद्र मोदी की शैली से सभी क्षेत्रीय दल नाराज हैं।

भाजपा में भी 70 फीसदी नेता मोदी-शाह की एकाधिकारवादी व्यवस्था से परेशान हैं। भाजपा अपने मूल चरित्र से हटकर चल रही है जहां सभी फैसले सिर्फ दो लोग ले रहे हैं। राजनाथ सिंह पार्टी में मोदी विरोधियों की धुरी बन चुके हैं जिनको योगी आदित्यनाथ, वसुंधरा राजे, शिवराज सिंह, रमन सिंह ये चार मुख्यमंत्री समर्थन कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव के टिकटों के बंटवारे तक ये अंदरूनी कलह खुलकर सतह पर आ जायेगी। लिहाजा इस सब का असर भाजपा के सत्ता से उतरने के रूप में सामने आने की संभावना है।

संजीव आचार्य 

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