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…तो फिर गुलदस्ता भी क्यों? ‘प्रैक्टिकल फंडा’ वरिष्ठ पत्रकार राजेश राठौर की कलम से

Posted on: 18 Jun 2018 09:08 by Surbhi Bhawsar
…तो फिर गुलदस्ता भी क्यों? ‘प्रैक्टिकल फंडा’ वरिष्ठ पत्रकार राजेश राठौर की कलम से

आमतौर पर ख़ुशी का कोई पल होता है तो हम महंगे गिफ्ट से लेकर गुलदस्तें उपहार में देते है। वैसे तो जिस तरह से देश में दहेज़ प्रथा और नुक्ता प्रथा बंद हो रही है, उसी तरह से अब उपहार प्रथा भी समाप्त हो जाना चाहिए। मैं आपको उपहार कथाएं कम शब्दों में बताना चाहता हूं। 27 साल के सार्वजनिक जीवन में कई मौके आए जब मैंने देखा कि विवाह समारोह में भगवान के दर्शन की तरह लंबी लाइन में लगकर लोग मंच पर जाकर उपहार देने के लिए उतावले होते है।

दुख होता है ये जानकार कि करोड़पति और अरबपति नेता, उद्योगपति, अफसर और वीआईपी भी उपहार लेने के लिए उतने ही उतावले होते है। आजतक मुझे समझ में नहीं आया कि इन बड़े लोगो को शर्म क्यों नही आती? आखिर ये लोग कब समझेंगे कि ये अपने से छोटे लोगो से उपहार लेना कब बंद करेंगे? जब बड़े लोगो को इन उपहार से कोई फर्क नहीं पड़ता तो फिर लेने में बेशर्मी क्यों ओड़ लेते है? क्या ये समारोह के आमंत्रण पर ऐसा नहीं लिख सकते कि हमे किसी उपहार या गुलदस्ते की नहीं आशीर्वाद की जरुरत है। वैसे इसकी शुरुआत हो चुकी है, पर मुझे साल में मिलने वाले हजार से ज्यादा आमंत्रण में से पांच फीसदी पर भी ऐसा लिखा हुआ नहीं मिलता।

वैसे में बता दूं कि मैं तो आमतौर पर उपहार और गुलदस्ते दोनों  देना बिलकुल पसंद नहीं करता हूं। कई बार तो ऐसा होता है कि मैं जिसने बुलाया है उनसे मिलकर चला आता हूं। मंच पर जाने के लिए लंबी भीड़ में खड़ा रहना मुनासिब नहीं समझता। किसी कमजोर के यहां समारोह में जाने पर जरुर उपहार देने की इच्छा होती है, पर कोशिश करता हूं कि उनकी किसी ओर तरीके से मदद कर दूं। कोई भी ये समझने को तैयार क्यों नहीं है कि अब समय आ गया है, जब हम उपहार के साथ-साथ गुलदस्ते देना भी बंद कर दे। कल मैं ज्यादा नहीं सिर्फ सात ईद मिलन समारोह में गया, मैंने देखा कि ये समारोह उन धनाड्य लोगो के यहा ये जिनको गुलदस्ते देने की भी जरुरत नहीं है। मैं तो जहां भी गया बिना संकोच के दिल से गले मिला, उनके लिए दुआ मांगी और चला आया।

बड़े लोगो के यहां समारोह हो तो ये भी बड़ी मुसीबत है कि 50 रूपये के गुलदस्ते से काम नहीं चलता। दिखावा करने वाले लोग हजार-पांच सौ से कम के गुलदस्ते नहीं देते। क्या ये पैसे की बर्बादी नहीं है? क्योकि इन गुलदस्तों की उम्र पांच-छः घंटे से ज्यादा की नहीं होती। वैसे बुलाने वालो में कुछ ने whatsapp पर ये मैसेज दिया था कि उपहार या गुलदस्ते ना लाए। ऐसे लोगो के यहां भी दिखावेबाज लोग अपनी हरकत से बाज नहीं आए। बड़े गुलदस्ते लाए, मैं उनकी तरफ देखकर एक दृश्य देख रहा था जो मुझे हर शहर के हर चौराहे पर दिखता है। कम कपड़े पहने हुए छोटे बच्चे जब कुछ मिलने की उम्मीद में बड़ी कार के पास आकर खड़े हो जाते है।

हालांकि इन बच्चो को खड़े करने वाले लोगो ने गैंग बना ली है। सरकारें और समाजसेवी संस्थाने भी इसको नहीं रोक पाई। मैंने देखा कि सौ-पचास गुलदस्ते मुझे बार-बार गुस्सा दिला रहे है। दिल और दिमाग में कुछ भी चल रहा हो, लेकिन पत्रकार होने के कारण सवाल पूछने की बिमारी है। मैंने बड़ा सा गुलदस्ता लाने वाले एक दम्पति (नाम लिखूंगा तो विवाद होगा) से पूछा कि आप जीनके यहां आए है, उन्होंने तो मैसेज किया था कि गुलदस्तें और उपहार दोनों नहीं लाना है, फिर आप क्यों लाए? तो वे बोले अब ऐसे आओ तो अच्छा नहीं लगता है।

मैंने सवाल दागा, आप समारोह में टैक्सी से आए, टेम्पो से आए, बस से आए या महंगी कार से आए इनको मालूम है क्या? अरे, फिर वो महिला बोली गुलदस्ता तो ख़ुशी का प्रतीक है। मैंने कहा जिसके यहां आप आए हो उनके यहां तो ख़ुशी के गोदाम भरे हुए है, आपकी इस ख़ुशी से क्या होगा। क्या आप इनके स्वस्थ रहने की दुआ नहीं मांग सकते। आखिरकार दम्पति शर्मिंदा हो गए और बोले आज आपने हमको अंदर से हिला दिया। अब हम आज के बाद किसी के यहां गुलदस्ते नहीं देंगे। मैं खुश हुआ कि चलो ईद मनाना और सिवईयां खाना मेरे लिए सार्थक हो गया।

देश के उन युवाओं से भी अपील है जो अपने मित्रो के जन्मदिन पर गुलदस्ते देते है वो देना बंद कर दे। उसकी बजाय अपने मित्र का कैरियर बन जाए इसकी भगवान से प्रार्थना कर सकते है। मैंने आज से ये जो प्रैक्टिकल फंडा लिखना शुरू किया है, वो सिर्फ भाषण देने या सलाह बांटने के लिए नहीं बल्कि पहले खुद अपनेआप से शुरुआत की, उसके बाद आपसे अपील की। अब आप मानो तो ठीक न मानो तो आपकी मर्जी। आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा। मेरा Email id- [email protected] और मोबाइल नंबर 9425055566 पर संदेश भेज सकते है।

sir-min

 

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