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आलू से सोना बनाने की मशीन

Posted on: 07 Feb 2019 10:34 by Ravindra Singh Rana
आलू से सोना बनाने की मशीन

अमित मंडलोई

खुशखबरी है कि अंतत: वह मशीन बना ही ली गई, जिसकी मदद से आलू को सोने में तब्दील किया जा सकता है। इधर से आलू डालें और उधर से सोना निकाल लें। मशीन बड़ी टेस्टेड है और तमाम प्रयोगों व कसौटियों पर खरी साबित हुई है। बावजूद इसके लिमिटेड एडिशन में है और चुनिंदा लोगों तक ही इसकी पहुंच है। आम लोग भी इसका इस्तेमाल करते देखे गए हैं, लेकिन इफरात से प्रयोग चंद हाथों तक सुरक्षित है। जनता की सलाहियत के लिए हम उसके कुछ सफल प्रयोगों की जानकारी साझा करना ठीक समझते हैं।

इसे इस्तेमाल करने का तरीका भी विशिष्ट होता है। पहले मदारी की तरह डमरू बजाना होता है। डमरू के दोनों ओर बंधी रस्सियां उस पर कसे चमड़े पर पड़ती हैं, जिससे कोलाहाल होता है। ये रस्सियां जांच एजेंसियां और करामाती राजनेता भी हो सकते हैं। इससे भय पैदा किया जाता है, जिससे आलुओं में हलचल होती है। कई आलू जो ज्यादा खाद, पानी डकार लेते हैं, उन्हें भय ज्यादा लगता है और वे खुद ब खुद मशीन के सामने आकर खड़े हो जाते हैं। नाचने लगते हैं, डम-डम पर थिरकने लगते हैं। तभी डमरू की दोनों रस्सियां लंबी होकर निकलती है और उन नेताओं को खींच लेती है। नेता मशीन में जाते हैं और सोने की तरह निखर उठते हैं।

अब बंगाल की पूर्व आईपीएस भारती घोष को ही देखिए। जांच में उनके घर से ढाई करोड़ रुपए बरामद हुए थे। 300 करोड़ की जमीन खरीदी के कुछ दस्तावेज भी मिले थे। एजेंसी ने उन्हें मोस्ट वांटेड तक घोषित कर दिया था। उन पर आपराधिक षड्यंत्र और जबरन वसूली के आरोप हैं। पति अभी भी जेल में हैं। कभी ममता बैनर्जी के करीब थी, लेकिन एक चुनाव में समीकरण ऊपर-नीचे हुए और दी ने मीटर डाउन कर दिया, उसके बाद इन्होंने भी नौकरी को नमस्ते कर दिया। अब वे भाजपा में आ गई है, राष्ट्रीय महासचिव उनका स्वागत, वंदन, अभिनंदन कर रहे हैं।

बंगाल में ही हैं तो मुकुल राय का किस्सा भी कौन पुराना है। शारदा चिटफंड घोटाले में कभी मुख्य आरोपी रहे हैं। उन पर शारदा के चेयरमैन सुदीप्त सेन को भगाने का आरोप भी लगा था। तृणमूल कांग्रेस के नेता रहे हैं, यूपीए सरकार में रेल मंत्री भी थे। सीबीआई ने चिटफंड घोटाले में आठ घंटे तक पूछताछ की थी। बाद में महाशय भाजपा में आ गए, उसके बाद से उनकी स्थिति बदल गई। अब वे कहते हैं कि चिटफंड घोटाले में वे आरोपी नहीं बल्कि गवाह हैं। वे ही राष्ट्रीय महासचिव को सुझाव दे रहे हैं कि केंद्र से कुछ अफसर ले आइये, वे स्थानीय अफसरों में भय पैदा करेंगे और हम निर्भय हो जाएंगे।

पड़ोसी राज्य असम का किस्सा भी अलग नहीं है। यहां हेमंत बिस्वा शर्मा हुए हैं। उनका नाम भी चिटफंड घोटाले में खूब उछला था। पूछताछ भी जमकर हुई। पत्नी के न्यूज चैनल और घर पर छापा भी मारा गया, लेकिन अब सब ठीक है। सीबीआई इनसे दूर है और आरोप पत्र से इनका नाम नदारद है। निश्चित तौर पर जांच में ही ऐसा साबित हुआ होगा, जिसके बाद ही ऐसे स्वर्णिम परिणाम प्राप्त हुए होंगे।

पुरानी कहानियां खोजना शुरू करेंगे तो गिनते-गिनते थक जाएंगे, लेकिन नाम खत्म नहीं होंगे। सुखराम से भी शुरू कर सकते हैं। फिर अजीत जोगी भी आएंगे और नवजोतसिंह सिद्धू भी प्रकट होंगे। उनका भी कायांतरण ऐसे ही हुआ था। अपने बसपा वाले स्वामी प्रसाद मौर्य की कहानी भी अलग नहीं है और नरेश अग्रवाल के तो इस मामले में क्या कहने।

कभी यहां-कभी वहां, कभी खुद की पार्टी। कैसे भी सदा सत्ता के साथी। उमा भारती अंदर-बाहर जाकर यह कौतुक दिखा चुकी। अमरसिंह की लीला भी इस मामले में अमरत्व को प्राप्त है। बस मप्र में बाबूलाल गौर इन सबसे ऊपर हैं। दोनों ही पार्टियों को समझ ही नहीं आ रहा है कि उन्हें आलू समझें या सोना।

कहानी का कुल जमा हासिल यह है कि भैये, जिस मशीन का सपना युवराज ने देखा था उस मशीन का इस्तेमाल भारतीय राजनीति युगों से करती चली आ रही है। बाहर रहे तो भ्रष्ट, बेइमान, चोर, चंदाखोर और पार्टी में आ जाए तो देशप्रेमी, राष्ट्रभक्त, गरीबों का मसीहा, हर दिल अजीज बन जाते हैं। है ना कमाल की मशीन, आलू डालो सोना निकालो।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। फेसबुक पेज से साभार

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