Breaking News

लोकलुभावन नारे राजनीतिक दोगलापन है!

Posted on: 11 Feb 2019 19:54 by Rakesh Saini
लोकलुभावन नारे राजनीतिक दोगलापन है!

सतीश जोशी

नरेंद्र मोदी सरकार के आखिरी बजट के संदर्भ में यह मानकर चला जा रहा है कि यह बजट चुनावी बजट होगा, जिसमें चार वर्षों से कठोर फैसले के लिए जानी जाने वाली सरकार अब आम जनता को आकर्षित करेगी, राहत देगी। पिछले एक महीने में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी तीन बड़ी घोषणाएं कर चुके हैं-किसान कर्ज माफी, न्यूनतम आमदनी की गारंटी और महिला आरक्षण। क्या वह बताएंगे कि इसमें ऐसा क्या है जो कांग्रेस की ओर से पहली बार कहा जा रहा है? चुनाव के समय की जाने वाली इन घोषणाओं का सीधा अर्थ है जनता को अपनी ओर आकर्षित करना, अपने पक्ष में वोट डालने की स्थितियां पैदा करना। बदले हुए हालात में ये चुनाव अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण हैं लेकिन प्रश्न यह है कि नये भारत के निर्माण में इस चुनाव की निर्णायक भूमिका पर फिर भी संदेहों के घेरे क्यों है?किसानों का कर्ज लगभग चार लाख करोड़ रुपए है। अगर न्यूनतम आमदनी योजना लागू की जाए तो उस पर भी लगभग सात लाख करोड़ रुपए का खर्च आएगा।

क्या भारत फिलहाल इस स्थिति में है कि बाकी जन कल्याणकारी योजनाओं के साथ इतनी बड़ी योजना शुरू की जा सके? क्या यह सच नहीं कि 50 साल पहले कांग्रेस ने गरीबी हटाने का नारा दिया था? कांग्रेस के आखिरी कार्यकाल यानि संप्रग-दो के वक्त तक भारत में गरीबी का आंकड़ा लगभग 30 फीसद था। अगर न्यूनतम आमदनी गरीबी खत्म करने की गारंटी है तो इतने वर्षों तक उसे क्यों नहीं लागू किया गया? पूर्ण बहुमत हासिल कर सरकार चलाने के बाद भी यह हाल है तो फिर सवाल है कि ऐसे चुनावी वादों पर जनता भरोसा ही क्यों करे?
आम जनता यह भलीभांति जानती है कि एक राजनीतिक दल की भारी-भरकम लोकलुभावन घोषणाएं सत्ता की सीढ़ी चढ़ते हुए हांफने लगती हैं। उसके सामने कभी संसाधन तो कभी राजनीतिक मजबूरी आड़े आती रही है। आखिर राजनीतिक दलों के इस शह-मात में जनता कहां खड़ी है? उसके हाथ क्या लगने वाला है? जनता कब बुनियादी समस्याओं से मुक्त होगी? सार्वजनिक जीवन से भ्रष्टाचार मिटाने की बातें बहुत अच्छी लगती हैं और कई बार इससे यह उम्मीद भी पैदा होती है कि पूरा नहीं तो थोड़ी ही सही, भ्रष्टाचार में कमी आएगी लेकिन कोई भी दल यह नहीं बताता सत्ता में आने के बाद वो इसके लिए कौन से कदम उठाएगा।

आम जनता को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है कानूनी औपचारिकताएं। इनको सरल एवं सहज बनाने की दिशा में अब तक ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। आज भी आम आदमी विवाह, जन्म और मृत्यु प्रमाण-पत्र जैसी चीजों के न मिलने या फिर स्कूल और अस्पताल में प्रवेश न मिलने की जटिल एवं विकट स्थितियों से रूबरू हैं। गैर-कानूनी तरीकों का सहारा लिए बगैर ड्राइवरी का लाइसेंस बनाना या घर की रजिस्ट्री कराना भी कठिन है। घूस दिए बिना या निचले स्तर की बाबूगिरी से पार पाए बगैर जमीन-जायदाद का स्थानांतरण, जमीन, मकान, फ्लैट की रजिस्ट्री इत्यादि कराना संभव नहीं है। तकरीबन 80 फीसदी आम भारतीयों के लिए रोज-ब-रोज का भ्रष्टाचार, कुप्रशासन और दैनिक सुविधाओं का अभाव सबसे बड़ी समस्या है लेकिन चुनावों के दौरान या अन्यथा भी वर्तमान राजनीतिक विमर्श में इन मुद्दों की कोई खास चर्चा नहीं होना राजनीतिक दोगलेपन को ही उजागर करता हैं।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

Latest News

Copyrights © Ghamasan.com