सोनिया का भेदी रायबरेली ढाए | Sonia Gandhi in Rae Bareli

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स्थापित कहावत तो है ‘घर का भेदी लंका ढाए’ लेकिन इसका नया राजनीतिक तर्जुमा जो इन दिनों आकार ले रहा है वो है ‘सोनिया का भेदी रायबरेली ढाए।’ इसका कारण है इस बार रायबरेली लोकसभा सीट से अब तक अपराजेय रही सोनिया गांधी को इस बार एक अलग तरह की परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उनका चुनावी मुकाबला भाजपा के प्रत्याशी दिनेश प्रताप सिंह से होगा। दिनेश कुछ समय पहले तक सोनिया गांधी के रणनीतिकारों में से एक हुआ करते थे।

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उनका पूरा परिवार कांग्रेसी है और ढेर सारे राजनीतिक पद उनके पास है। वे पिछले सा ही अपने भाइयों के साथ भाजपा में पहुंचे हैं। चूंकि उन्हें लोकसभा का टिकट भी मिल गया इसलिए उनके चार भाई भी उनका बढ़-चढ़कर समर्थन कर रहे हैं। स्वयं दिनेश कहते हैं हम पांच भाई पांडव की तरह हैं जो इस कुरुक्षेत्र को जीतने के लिए काफी हैं। सोनिया गांधी(soniagandhi) का नाम बड़ा है, सबको पता है, लेकिन काम उनके इतने छोटे हैं और दिनेश सिंह(DineshSingh) के काम इतने बड़े हैं कि इस बार नाम और काम की लड़ाई में इस बार काम इस बार जीतेगा।

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गांधी परिवार के काफी करीबी रहे दिनेश कांग्रेस(Congress) से ही एमएलसी भी रह चुके हैं। उनके तीन भाई राजनीति में सक्रिय हैं। राकेश सिंह 2017 में हरचंदपुर से कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने थे। अवधेश सिंह रायबरेली जिला पंचायत के अध्यक्ष हैं। फिर वे सोनिया से खफा क्यों हुए? इसके जवाब में जानकार बताते हैं रायबरेली में एक और ठाकुर परिवार प्रभावी है। वह है अखिलेश सिंह का। पहले अखिलेश कांग्रेस से बाहर थे और दिनेश सिंह कांग्रेस में थे। 2017 विधानसभा चुनाव के पहले अखिलेश परिवार की अदिति सिंह कांग्रेस में शामिल हुईं, जिसके बाद से दिनेश का रुतबा घटने लगा।

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अदिति रायबरेली सदर सीट से विधायक भी चुनी गईं। इसी वजह से दिनेश को पार्टी भी छोड़ना पड़ी। अन्यथा कोई जमाना था जब दिनेश की हवेली ‘पंचवटी’ से ही सोनिया के चुनाव की तैयारियां हुआ करती थीं। अब कांग्रेस के रणीनीतिकार इस सर्वथा नई परिस्थिति का राजनीतिक स्तर पर मुकाबला करने के लिए रणनीति बनाने में जुटे हैं। उन्हें यह भरोसा जरूर है कि गांधी परिवार में श्रद्धा रखने वाला वोट बैंक किसी भी हालत में नहीं टुटेगा औऱ वही जीत का आधार भी बनेगा। उधर, रायबरेली से पांचवी बार पर्चा दाखिल करने के साथ सोनिया ने नरेंद्र मोदी(narendramodi) को २००४ का फील गुड का दौर भी याद दिलाया, जब अटलजी की सरकार को लोकसभा चुनाव(loksabha election) हारकर सत्ता ही गंवाना पड़ी थी। उसके बाद दस साल तक कांग्रेस नीत यूपीए गठबंधन सत्ता में रहे।

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