मूल्यों व नीतियों पर आधारित राजनीति हो

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लेखक – नारायण पटेल

ये सच है कि हम कलयुग में जी रहे है,जहाँ राजनीति में नैतिकता और नीतियां का स्थान गौण सा हो गया है। वर्तमान नेताओं का तो येन केन प्रकरेण सत्ता अथवा पद प्राप्ति ही उद्देश्य रह गया है। पौराणिक समय में महाभारत सहित सारे युद्धों में भी नीतिशास्त्र और रजामंदी से बनाये गए मानवीय आधार के नियमों के अनुसार युद्ध होते थे। उन युद्धों में भी नीति,मर्यादा और मानवीयता होती थी। लेकिन आज की इस कलयुगी राजनीति में नैतिक मूल्यों का भारी पतन देखने को मिल रहा है।

हमारे देश के नेताओं ने जिस लोकतंत्रीय व्यवस्था को अपनाया उसमें हर पांच वर्ष में चुनाव होते है। उन्हें चुनाव में जनता के बीच भी जाना पड़ता है इसलिए उनसे पहले से अधिक उम्मीद भी होना चाहिए। आज उम्मीदवार नैतिकता छोड़ किसी भी कीमत पर चुनाव जीतने की कोशिश में रहता है। अनेक बार वह मान मर्यादाओं को तो ताक पर रखता ही है समाज को अनेक बुराइयों के मायाजाल में धकेल देता है। इतिहास पर नज़र दौड़ाएं तो हमारे महान नेताओं ने जिन मूल्यों व सिद्धांतो की राजनीति का मार्ग दिखाया उसे हम भूलते जा रहे है। देशहित के मुद्दे पर वो एक हो जाया करते थे।

ज्ञात हो आज़ादी के तत्काल बाद बनी पं. नेहरू की सरकार में बाबा साहब अम्बेडकर और डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी को उनकी योग्यता देखते हुए स्वयं गांधीजी ने नेहरू मंत्रिमंडल में शामिल करवाया था और वे भी देशहित ही में राजी भी हुए थे। कुछ दशकों पूर्व ही तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.व्ही. नरसिंहव्हाराव ने भारत का पक्ष रखने हेतु अटलजी को जिनेवा भेजा था,वे सहर्ष गए और भारत का पक्ष जोरदार ढंग से रखा। 1971 में बांग्लादेश के उदय और 1974 में पोखरण-1 के समय भी अटलजी जैसे विरोधी दल के नेता ने भी इंदिराजी की प्रशंसा की थी। लेकिन आज उस भावना का भी कहीं न कहीं ह्यस होता दिखलाई पड़ रहा है।

मेरा मत है कि आज भी हमें उन त्यागी,बलिदानी और तपस्वी राजनेताओं से प्रेरणा लेकर देश हित में राजनीति करनी चाहिए। अगर हमारे निजी हित के बदले राष्ट्र को फायदा पहुंच रहा हो तो हमें देश को प्रथम मानकर निर्णय लेने चाहिए। राजनीति व्यक्तिवादी न होकर मुद्दे आधारित होना चाहिए। तर्कों और बहस के स्तर को भी इतना मर्यादित रखना चाहिए कि आपसी भाईचारा कायम रहे। आज की राजनीति में धनबल और बाहुबल का अत्यधिक प्रयोग होने लगा है उसमें भी सुधार की आवश्यकता है।

सभी धर्मों और समुदायों की भावना को भी एक दूसरे ने खयाल रखना चाहिए। पहले देश, फिर दल और अंत में परिवार की चिंता करेंगे तभी नीति के अनुसार राज चल सकता है और यही सही राजनीति भी है। सूचितापूर्ण, सिद्धांतो,नीतियों और मर्यादित आचरणों द्वारा राजनीति करने वाले नेता ही महान बनता है। जिस दल में इन बातों का खयाल रखा जाएगा वही दल लंबे समय तक देश की राजनीति में टिक भी पायेगा। देखा जाए तो व्यक्तित्व निर्माण की पाठशाला सिर्फ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ही है जिसका सीधा लाभ भाजपा जैसे दल को मिलता है और यही कारण है कि वह आज दुनिया का सबसे बड़ा राजनैतिक दल है।

राजनीति करते समय ध्यान रहे कि हमारे आचरण से अपने दल की छवि धूमिल न हो। अगर दल और देश हित में कभी पद या सत्ता त्यागना भी पड़े तो उसे किंचित संकोच नहीं करना चाहिए। लोकतंत्र में संपर्क और संवाद ही राजनीति करने का मूलमंत्र होता है, अतः प्रयास करें कि अधिक से अधिक लोगों से विनम्रता व सम्मान पूर्वक सतत संपर्क और संवाद बना रहे। मेरा मानना है कि जनता के हर सुख दुख में हम सहभागी बनें वही नेता ही उपलब्धि हासिल करता है। भारत विविधताओं से भरा देश है जहाँ क्षेत्रीय व सामाजिक भिन्नतायें है वहाँ समान आधार पर सभी की भावना का सम्मान आवश्यक है। अतः भविष्य में मूल्यों व नीतियों पर आधारित सुचितापूर्ण और स्वच्छ राजनीति ही टिकाऊ साबित होगी, जो कालांतर में हमारे देश और दल के हित में दूरगामी सकारात्मक परिणाम देगी। इसके कारण व्यक्तिगत लाभ के साथ लोकतंत्र तो परिपक्व होगा ही देश की राजनीति में आनेवाली पीढ़ियों भी हमसे प्रेरणा लेती रहेगी।

 

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