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‘उल्लू बनाविंग’ का सियासी फार्मूला और तेलंगाना में उल्लुअों की शामत!

Posted on: 04 Dec 2018 11:51 by Ravindra Singh Rana
‘उल्लू बनाविंग’ का सियासी फार्मूला और तेलंगाना में उल्लुअों की शामत!

अजय बोकिल की कलम से

कुछ साल पहले राजनेताअों पर कटाक्ष करता आइडिया का एक विज्ञापन बहुत चर्चित हुआ था-‘नो उल्लू बनाविंग।‘ लेकिन तेलंगाना विधानसभा चुनाव में तो नेताअों के कारण खुद उल्लुअों की ही शामत आ गई है। वहां 7 दिसंबर को मतदान होना है। इसके पहले ही राज्य में उल्लुअों की मांग बेतहाशा बढ़ गई है। नतीजनत पड़ोसी राज्य कर्नाटक में तेजी से उल्लू गायब होते जा रहे हैं। इसका खुलासा तब हुआ, जब कर्नाटक के कलबुर्गी में पुलिस ने 6 लोगों को इंडियन ईगल आउल की तस्करी में पकड़ा। उल्लू तस्करों ने बताया कि तेलंगाना में चुनाव लड़ रहे राजनेताओं ने रात में जगने वाले पक्षियों का ऑर्डर दिया है। इसके माध्यम से वे अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदवी को वश में करना चाहते हैं। और रात में जगने वाला पक्षी उल्लू ही है। तस्कर ये उल्लू तीन से चार लाख रू. में बेचने की फिराक में थे। हालांकि इसके पहले कितने उल्लू चुनाव की भेंट की चढ़ गए, इसकी जानकारी नहीं है।

यूं तो उल्लू भी एक पक्षी ही है। लेकिन इसकी शक्ल, आवाज और व्यवहार को लेकर एक रहस्य का आवरण हमेशा से रहा है। तांत्रिकों ने इसे और हवा दे रखी है। भारत में उल्लुअो की 34 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनकी असाधारण रूप से बड़ी-बड़ी डरावनी आंखे और रात को अजीब सी आवाज निकाल कर जागना, अंधविश्वास को बल देता है। हमारे देश में दिवाली की रात तांत्रिक साधना में उल्लुअों की बलि दी जाती है। उल्लू धन की देवी लक्ष्मी का वाहन भी है। उल्लू अकेला ऐसा प्राणी है, जो बुद्धिमत्ता और मूर्खता दोनो का परिचायक है। हालांकि लोक व्यवहार में उल्लू को मूर्खता से ही जोड़कर ज्यादा देखा जाता है। लिहाजा हिंदी में उल्लू बनाना, अपना उल्लू सीधा करना अथवा ‘काठ का उल्लू होना’ जैसे मुहावरे प्रचलित हैं।

लेकिन राजनेताअो से उल्लू का रूपक इस आधार पर जोड़ा गया है ‍कि वो हर पांच साल में जनता को मूर्ख बनाते हैं और जनता का इसलिए कि वह हर चुनाव में खुद को मूर्ख बनाने का परवाना सत्ता के रूप में नेताअों को सौंप देती है। दूसरे शब्दों में कहें तो य ह परस्पर उल्लू बनाने का लोकतांत्रिक सौदा है। जिसका नवीनीकरण प्रत्येक पांच वर्ष में होता है।

सवाल यह है कि राजनेताअों को अपने स्वार्थ के लिए असली उल्लुअों की दरकार क्यों है? क्या जनता को उल्लू बनाना ही काफी नहीं है? इन सवालों का जवाब यह है कि जब नेता चुनावी युद्ध अपने राजनीतिक पराक्रम से जीतने में खुद को अक्षम पाते हैं तो उल्लुअों पर भरोसा करने लगते हैं। उल्लू को काले जादू से भी जोड़ा जाता है। तंत्र शास्त्र में उल्लू का लगभग हर अंग-प्रत्यंग काम का माना गया है। चाहे वह उल्लू के पंख हों, नाखून हों, पंजे, चोंच या रीढ़ की हड्डी हो, सब तंत्र साधना के काम आते हैं। इन्हीं में एक है शत्रु वशीकरण। अगर उल्लू के अभिमंत्रित अंग शत्रु के घर के सामने फेंक दिए जाएं तो वह वश में हो जाता है। चुनावी भाषा में वोटिंग से पहले ही सरेंडर हो जाता है। इस अर्थ में चुनाव जीतने का यह तांत्रिक शाॅर्ट कट है। तेलंगाना में ऐसे उल्लू आश्रितों में विपक्षी उम्मीदवारों की संख्या ज्यादा बताई जाती है।

उल्लू मनुष्य के अंधविश्वास का मारा है। उसमें अपनी गर्दन 270 डिग्री तक घुमा पाने की क्षमता होती है। इसलिए माना जाता है ‍कि उसमें छिपे खजाने को तलाशने की महारत होती है एक अंधमान्यता और है कि उल्लू को किसी भी संकट का पूर्वानुमान हो जाता है। इसलिए उल्लू का होना या दिखना ‘अपशगुन’ या अनिष्ट का संकेत माना जाता है। उल्लू अंधेरे में भी अच्छे ढंग से देख लेते हैं। हालांकि कुछ मामलो में उल्लू को देखना शुभ भी माना जाता है। कई देशों में उल्लू को मृत्यु से जोड़कर देखा जाता है तो फेंग शुई में इसे सौभाग्य का प्रतीक माना गया है।

बहरहाल यहां मुद्दा राजनेताअो के उल्लू प्रेम का है और इस अवांछित प्रेम के चलते उल्लुअों के वजूद पर मंडराते संकट का है। चुनावी वशीकरण का जो खेल तेलंगाना में चल रहा है, वह दूसरे राज्यों में कमोबेश होता ही होगा। लेकिन इसकी वजह से कर्नाटक उल्लुअों के अवैध कारोबार का अड्डा बन गया है। हालांकि भारत में कई प्रकृति प्रेमी संगठन उल्लुअोंको निसर्ग की अनुपम देन मानकर उसे बचाने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं।

पुणे में हाल में दो दिवसीय उल्लू उत्सव आयोजित किया गया ताकि लोगों में उल्लुअोंके संरक्षण को लेकर जागरूकता बढ़े।
वैसे उल्लू अपने आप में ‍निरीह प्राणी है। मनुष्य ने उसे अपने स्वार्थ के लिए किन गुणों से उसे जोड़‍ रखा है, इसका एहसास भी उसे नहीं होगा। विडंबना यह है कि जहां तक राजनीति, राजनेता और राज शैली का प्रश्न है तो उल्लू की छाया हर जगह मौजूद है। चाहे वह धनार्जन के अर्थ में हो, चाहे राजनीतिक उल्लू सीधा करने के मकसद से हो, जन संवेदनाअोंको लेकर काठ का उल्लू साबित होने को लेकर हो या फिर जनता को हर बात में ‘उल्लू बनाविंग’ का चरित्र हो। अभी तक चुनाव आयोग का ध्यान इस ‘उलूक तंत्र साधना’ पर नहीं गया है। भविष्य में उसे चुनाव आचार संहिता के प्रतिबंधों में में उल्लुअों को पकड़ने अथवा उसकी बलि देने आदि को भी शामिल करना होगा।
उल्लू और राजनेताअों में बुनियादी फर्क यह है कि उल्लू जैसा भी है, वैसा ही रहता है। उसे रंग बदलना या या किसी को उल्लू बनाना नहीं आता। लेकिन राजनेता सत्ता स्वार्थ के लिए हर वक्त उल्लुअों की तलाश में रहते हैं।

उल्लू बनना कोई प्राकृतिक रूपातरंण नहीं है, वह एक गुणात्मक पतन या ‍दुरावस्था है। वह एक गाली भी है। उल्लू बनाने में एक सार्वजनिक उद्दंडता और असहाय की खिल्ली उड़ाने का भाव है, जबकि उल्लू बनने में जानबूझ कर अोढ़ी गई मूर्खता और निरीहता का स्थायी तत्व है। जिसका लाभ राज सत्ता को हथियाने या छीनने में राज नेता बड़ी आसानी से कर लेते हैं। यह मनुष्य की कुटिलता है। वरना उल्लू आपस में एक दूसरे को उल्लू बनाते हैं या बनाते होंगे, यह कला उन्हें आती है या नहीं, इसका कोई प्रमाण हमारे पास नहीं है। उन्हें यह भी नहीं पता कि उनकी बलि से मनुष्य अपने स्वार्थ साध लेता है। इस मायने में उल्लू भी उल्लू ही साबित हो रहे हैं। शायद वो समझ सकते कि इस देश में चुनाव भी वास्तव में उल्लू बनाने का खेल ही है।

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