क्या उन्नाव कांड में इन सवालों के उत्तर पुलिस, पार्टी, प्रशासन के पास हैं?

मध्यकाल की बर्बर कथाओं के खलनायक अपने सर्वाधिक हिंसक और रौद्र रूप में एक बार फिर हमारे सामने हैं।

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राजेश बादल

नोट :कृपया इसे राजनीतिक चश्में से न देखें और न ही इसे मीडिया ट्रायल समझने का प्रयास करें.यह पूरी तरह मानवीय संवेदनाओं पर आधारित है.

उन्नाव-काण्ड किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक है। मध्यकाल की बर्बर कथाओं के खलनायक अपने सर्वाधिक हिंसक और रौद्र रूप में एक बार फिर हमारे सामने हैं। किसी को भी यह अनुमान लगाने में पल भर नहीं लगेगा कि अब बागड़ ही खेत को खाने लगी है। न्याय अवाम के हाथ से फिसल चुका है। जिसकी लाठी है ,भैंस भी उसी की है। उन्नाव की दुष्कर्म पीड़िता के साथ समूचा देश खड़ा है। उस बेचारी के पास अब खोने को कुछ नहीं बचा है .पाने के लिए न्याय था ,जो अब मिलता नहीं दिखाई दे रहा है। आज तक के घटनाक्रम के आधार पर कुछ बुनियादी सवाल खड़े होते हैं। आमतौर पर किसी भी केस में दो तरह केसाक्ष्य होते हैं -एक तो सीधे या डायरेक्ट सुबूत और दूसरे परिस्थितिजन्य साक्ष्य.इस मामले में
( अ ) सीधे सुबूत

  • क्या उन्नाव कांड में इन सवालों के उत्तर पुलिस, पार्टी, प्रशासन के पास हैं? पीड़िता – उसे मारने की पक्की कोशिश .वह अब जीवन मरण के बीच झूल रही है।
  • पीड़िता के पिता – उन्हें जेल में डाला गया .जेल का मामला आरोपी विधायक ने दर्ज़ कराया था। वहाँ आरोपी विधायक के लोगों कीपिटाई से मौत।
  • एक प्रत्यक्षदर्शी – उसकी संदिग्ध हाल में मौत हो गई।
  • पीड़िता की चाची -मामले की प्रत्यक्षदर्शी. उसकी भी रविवार को ट्रक की टक्कर से मौत हो गई।
  • पीड़िता दुष्कर्म के समय नाबालिग़ थी। ऐसे में अपराध साबित होने पर आरोपी विधायक को उम्र क़ैद तक हो सकती है।
  • न्याय न मिलने पर इज़्ज़त के लिए पीड़िता की आत्महत्या की कोशिश।

(ब) परिस्थितिजन्य साक्ष्य

  • इस मामले में पीड़िता के सगे चाचा ही उसके वकील हैं। वे जेल में भेज दिए जाते हैं। उनके स्थान पर जो वकील आते हैं ,उनकी भी ट्रक की टक्कर से मौत हो गई .वे ही कार ड्राइव कर रहे थे।
  • वह सड़क चार गाड़ियों के निकलने के बराबर चौड़ी थी। सामने से ट्रक आकर अपनी सीधी लाइन छोड़कर सामने से आ रही कार पर चढ़ बैठता है।
  • ट्रक की नंबर प्लेट पर कालिख़ पोती गई थी। क्या हाई वे पर कोई गाड़ी इस तरह निकल सकती है। भारत का मोटर व्हीकल एक्ट बहुत कठोर है। इस पर दो दिन तक कोई प्रकरण दर्ज़ नहीं हुआ।उल्टे एक आईपीएस ने इतनी तेज़ रफ़्तार से जांच की कि ट्रक मालिक के किसी आदमी से क़र्ज़ लेने की कहानी मीडिया को बता दी।
  • सवाल यह है कि ट्रक के लिए निजी क़र्ज़ अगर पाँच लाख से भी अधिक है तो नक़द क्यों लिया गया। सरकार ने तो इतनी अधिक राशि के कैश लेनदेन पर रोक लगा रखी है। क़र्ज़ किससे लिया गया ,कब लिया गया ,क्या क़र्ज़ देने वाले के पास सूदखोरी का लायसेंस था?इस पर पुलिस ने कुछ नहीं किया. ज़ाहिर है,कहानी गढ़ी गई है।
  • ट्रक – कार टक्कर के समय 9 सुरक्षाकर्मी नहीं थे। सारे एक साथ ग़ायब. क़ानूनन एक गनर तो हर हाल में होना ही चाहिए था। सुरक्षाकर्मियों के तार आरोपी विधायक से जुड़ते हैं। उसके सहयोगियों से सुरक्षा कर्मियों की बात होती थी। क्यों नहीं सुरक्षा कर्मियों के ख़िलाफ़ हत्या की साज़िश में शामिल होने का मामला दर्ज़ किया गया ? जो सुरक्षा मांग रहे थे ,वे कैसे मना कर सकते थे ? ज़ाहिर है यह कहानी भी गढ़ी गई है। साज़िश तो ऐसी रची गई थी कि कार में सवार सारे लोग मारे जाते। फिर सुरक्षाकर्मियों को मना करने की कहानी गढ़ने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।
  • डीजीपी कहते हैं कि परिवार कहे तो सीबीआई जांच कराई जाएगी। एक डीजीपी को यह क्यों कहना चाहिए ,जबकि सीबीआई को केस सौंपने काअधिकार उनके पास है ही नहीं। यह तो राज्य सरकार जब केंद्र से अनुशंसा करेगी तो ही सीबीआई जांच करेगी। दूसरी बात पीड़िता के जिस परिवार की बात डीजीपी कर रहे हैं ,क़ानूनन उस परिवार में है ही कौन ? पीड़िता बचेगी तभी कुछ कहने की स्थिति में आएगी।
  • सवाल है कि चाचा को जेल में क्यों डाला गया क्योंकि वह पीड़िता का सगा चाचा है। वह केस लड़ेगा तो जीतने के लिए जान लगा देगा। उसकी भतीजी या एक तरह से उसकी बेटी की इज़्ज़त का मामला है।.इसीलिए उसे जेल भेजा गया .दूसरा वकील किया जाएगा तो एक बार उसे प्रभावित करने की कोशिश हो सकती है।
  • आरोपी विधायक सारे सुबूत इसलिए मिटा रहे हैं क्योंकि अगर साक्ष्य उनके ख़िलाफ़ गए तो सौ फीसदी आजीवन क़ैद होगी। उनका राजनीतिक करियर समाप्त हो जाएगा। कोई सज़ा याफ्ता व्यक्ति ज़िंदगी में कभी चुनाव नहीं लड़ पाएगा। इसलिए अब सुबूत नष्ट होने से उनके बचने की गारंटी बढ़ गई है। कितनी ही कठोर धाराएं लगा दी जाएँ , सज़ा तो तभी होगी,जब साक्ष्य होंगे।

पार्टी अब तक क्यों चुप रही

  • उनतीस जुलाई को किसी चैनल की चर्चा में बीजेपी के प्रवक्ता ने कहा कि विधायक अब पार्टी में नहीं हैं। न इसकी कोई औपचारिक घोषणा हुई और न इसकी सूचना पार्टी विधायक दल की ओर से विधानसभा में दी गई। न ही विधानसभा ने कोई अधिसूचना जारी की।
  • प्रश्न है कि पार्टी दो साल से क्या कर रही थी। इसके उलट एक सांसद जेल में जाकर विधायक से मिलते हैं। उन्हें खेद नहीं होता न कोई मलाल। अगर विधायक पार्टी से बाहर हैं तो वे एक आम अपराधी हैं और एक अपराधी से जेल में जाकर मिलने पर सांसद से स्पष्टीकरण क्यों नहीं मांगा गया?

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