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ऐसे न मुझे तुम छेड़ो, AIG मलय जैन की कलम से

Posted on: 19 May 2018 11:35 by Ravindra Singh Rana
ऐसे न मुझे तुम छेड़ो, AIG मलय जैन की कलम से

न जाने क्या है कि शहर में या अढ़ाई सौ मील दूर के किसी क़स्बे में पुलिस चेकिंग शुरू करती है और इधर मित्रों रिश्तेदारों के फोन आने शुरू हो जाते हैं । हमने तो कई मर्तबे अपनी किस्मत को धन्य माना और खोपड़ी पर ज़ोर भी डाला कि वल्लाह , किसके दीदार किये थे अल्लसुबह आज कि ईद के चांद हुए मित्र या जिज्जी की जबलपुर वाली जिठानी के लड़ियाये लल्ला को भरी दुपहरिया में एकाएक इस ग़रीब की याद हो आई। उछल उछलकर एकदमै गिर ही न पड़ने से कलेजे को बचाते हुए हम फोन उठाकर जब हाल ओ चाल जानने की कवायद करते हैं कि उधर से मित्र धरमसंकट में डाल कहता है , ” भाई , पुलिस ने पकड़ लिया ।

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“हम हैराने हो दरयाफ़्त करते हैं” मित्र , तुम तो एकदम सच्चरित्र और कायदे पसन्द हो , तुम्हारी कमीज़ पर चोरी , नकब्ज़नी , लूट – लठैती , डाका – डकैती तो छोड़ो , कुटैती – पिटैती और बकलोली- बकैती तक का दाग नहीं और …और ताउम्र ताकाझांकी से तौबा वाली तुम्हारी तबीयत की तारीफ़ से तो हरकोई वाकिफ़ है फिर तुम्हें क्यों पकड़ा मेरे दोस्त ! तब शरमाते हुए मित्र का उत्तर हस्ब ए मामूल वही होता है जिसका खुटका आदतन हमें पहिले से होता है ,” यार , हेलमेट नहीं न लगाये थे ” या ” सीट बेल्ट नहीं न लगाए थे ।

” यकीन मानिये , रिश्तों के इजलास में हमारी कलपी हुई आत्मा यकायक ज़िरह को व्याकुल हो जाती है , ” यार , मेरे आलिम , मेरे फ़ाज़िल , मेरे काबिल दोस्त , घर से खाने का डब्बा तो ले जाना नहीं न भूले थे ? पेट की चिन्ता , चिन्ता और जान की ?” हेलमेट और सीट बेल्ट के लिये हम फ़ोन कर बोलें कि छोड़ दो भाई , ये सही होगा क्या ? भइया , कमसकम ऐसे तो न मुझे तुम छेड़ो । अब तुमको हम क्या बताएं , हमारी इन आँखों ने वो कलेजा फट जाने वाले दृश्य देखे हैं जिनमें किसी के कलेजे के टुकड़े ने सिर्फ़ हैलमेट न लगाकर चलने के कारण अकाल अपनी जान दे दी । हमारे इन हाथों ने हाइवे पर दुर्घटना में चोटिल उन तमाम लोगों को अस्पताल पंहुचाया है जो अपने हाथ पैरों से या तो महरूम हो गये या अकाल मौत के शिकार ही हो गये ।

पता है क्यों , सिर्फ़ हैलमेट या सीट बेल्ट नहीं लगाने की वजह से । अब भी कहियेगा कि हम फ़ोन करें , शर्मिंदगी के मारे धरती मईया से फट जाने की गुहार मारते हम हमारे दरोगा जी से आग्रह करें कि मत काटो चालान मेरे यार का ताकि यार मूंछों पर ताव देता निकल ले और कल को दोगुने ठाठ के साथ बिना हैलमेट लगाये इतराता निकले , बिना सीट बेल्ट बांधे हवा से बातें करे , ख़ुद की और औरत बच्चों की चिंता किये बग़ैर ! मित्रो , हमारे जवान घण्टों ड्यूटी करते , कड़ी धूप में भतेरे धुँए और धूल के बीच , चौतरफ़ा आते , भागते , खाने को दौड़ते इन वाहनों के भब्बड़ में अपनी जान भी जोखिम में डालते यदि आपका चालान काटने के लिये विवश हो रहे हैं तो कोशिश करें न , ऐसी नौबत आये ही क्यों ? पढ़ा लिखा होना तो हमारी शक्ल से ही टपकता है और समझदार होना ? बात कड़वी तो है दोस्त , मगर हम क्या करें ! कानून भी और हम भी , आख़िर आप ही की सलामती तो चाहते हैं । तो बताइयेगा , ऐसा करो , वैसा न करो के लिये खाली बाल बछौना को ही टोकते रहियेगा या ख़ुद की आत्मा के नट बोल्ट भी कसियेगा ?

📝लेखक : श्री मलय जैन, ए.आई.जी., भोपाल पुलिस, म.प्र.

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