बस इंसा को नहीं थी खबर

0
18
amritsar_train_accident

होनी थी जो हो कर रही
ट्रेन पटरी पर थी चल रही
रोज़ का तय समय
हर साल का तय दहन
दहन का तय समय
मौत का भी तय समय
बस इंसा को नहीं ख़बर
विदारक हादसे के बाद की कहानी
ट्रेन से कटी फिर भी जान थी बाक़ी
आस्था का उन्माद था जमा
जलाने को आए थे रावण
ख़ुद ही कट गए अचानक
मानवता अभी थी ज़िंदा लोगों ने सुध ली
जिनमे थे बाक़ी प्राण उनकी दवा दारू की
एक बुज़ुर्ग का आधा शरीर कटा
क्षत विक्षत हुई उनकी काया
भूल अपनी पीड़ा युवा को बुलाया
उस समय जो ज्ञान हुआ उसे बताया
सौंप रहा तुमको एक ज़िम्मेदारी
तुम भी करना जब आए तुम्हारी बारी
नहीं बचूँगा समय कम है जान है जानी
करना मेरे नेत्रदान और अंगदान
शायद बच सके किसी की जान प्यारी
कहा युवा ने नमन आप को यह बात बताई।

निधि जैन, वरिष्ठ लेखिका की कलम से अमृतसर हादसे पर ताजा कविता

nidhi_jain_writer

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here