शशिकांत गुप्ते की एक कविता

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shahikant gupte

पूर्व में जो थे,
करते थे तुष्टता
ऐसे लगे उनपर आरोप,
सिद्ध हुए या नहीं?
लेकिन दुष्टता
अप्रत्यक्ष दिखाई दे रही है
या यूं कहें
की अघोषित है
चुपके,छुपके, हौले हौले
कौन बोले
जो भी बोले
सीधे उसकी देश भक्ति पर प्रश्न?
पता नहीं
पडौसी देश में
कितने भेजे जाएंगे
दूसरी ओर
अखंड भारत की कल्पना
करना है साकार
इससे भी आगे
वसुदेवकुटुम्ब की धारणा
घर मे वैमनस्य
अल्प और बहु संख्यक
नीच ऊंच
अगड़ा पिछड़ा
देश के वासी हैं
आदिवासी?
उच्च वर्ग का ही है भगवान
मांग लिया वरदान
सारी बुद्धि रखली अपने पास
ब्रह्म के ज्ञान की बात
यथार्थ में
भ्रम की स्थिति
हम करें या कहे वो ही कायदा,
लेकिन रखना यह भी
बांध कर गांठ
दड़प नीति नही चलेगी
इतिहास गवाह है
अन्तः
अंत बुरे का होता ही है बुरा
जवाब देता है समय खुद-ब-खुद
धैर्य रखना ही साहस है
कोई रात ऐसी नही है
जिसका सवेरा न हुआ

शशिकान्त गुप्ते

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