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पेट्रोल-डीजल की निरंकुश दाम वृद्धि : एक ‘भक्तिभावपूर्ण’ चिंतन ! अजय बोकिल की टिप्पणी

Posted on: 30 May 2018 06:20 by Ravindra Singh Rana
पेट्रोल-डीजल की  निरंकुश दाम वृद्धि : एक ‘भक्तिभावपूर्ण’ चिंतन ! अजय बोकिल की टिप्पणी

देश में पेट्रोल-डीजल के बेलगाम दामों को घटाने को लेकर मोदी सरकार जितने गंभीर प्रयास कर रही है, जितना विचार मंथन कर रही है, उसमें जो हिचक और नफासत है, उससे लगता है कि यह मसला कश्मीर से धारा 370 हटाने से भी ज्यादा जटिल है। क्योंकि जब लगातार सोलहवें दिन भी भाव बढ़ने की टैग लाइन आई तो लगा कि सरकार के हाथ में बढ़ते भावों को कौतुक भाव से देखते रहने के अलावा कुछ भी नहीं है।

उसने पेट्रोल डीजल के डायनामिक प्राइसिंग रेट का जो अश्वमेध छोड़ रखा है, वह इतना डायनामिक होगा, यह खुद रेट ने भी नहीं सोचा होगा। शायद यह अश्व खुद सरकार के काबू में नहीं रहा या फिर सरकार जनता को ही मूर्ख माने बैठी है। आजकल दिन निकलते ही लू की लपट के साथ जो चीज डराती है, वह पेट्रोल-डीजल के नंगे नाचते दाम हैं। चाहे टू व्हीलर वाला हो या आॅटो टैक्सी वाला या फिर लग्जरी गाड़ी वाला भी, अपनी जेब को छीजता देख थोड़ी देर के लिए ही सही आक्रोशित हो उठता है। यूं मानसून के साथ अपुष्ट खबर दुनिया में कच्चे तेल के भाव घटने की आई, लेकिन भारत में इसकी कोई गारंटी इसलिए नहीं है, क्योंकि सरकार दूसरा कोई टैक्स बढ़ाकर इस घाटे की भी पूर्ति कर लेगी।

ऐसा नहीं है कि तेल के दाम देश में पहली बार बढ़ रहे हों। जब तक आॅटोमोबाइल हमारी जिंदगी का अनिवार्य हिस्सा नहीं बने थे, तब तक पेट्रोल-डीजल के रेट घटने बढ़ने का हम पर खास असर नहीं होता था। लेकिन बीते तीन दशकों में हमारी जीवन शैली में पानी के बाद अब पेट्रोल का महत्व हो गया है। सरकारों ने इसी कमजोरी को अपनी ताकत बना लिया है। आप पेट्रोल के बगैर जी नहीं सकते और सरकार आपको पेट्रोल सस्ता देने की हिमाकत कर नहीं सकती। कारण जो अापकी मजबूरी है, वही सरकारों के लिए ‘लक्ष्मी’ है। वो अपना ही खजाना भरने में लगी हैं। हाल में खबर आई कि पेट्रोल-डीजल के दाम भड़कने से राज्यों को 2 माह में 18 हजार 728 करोड़ की अतिरिक्त कमाई हुई। है न खुशी की बात !

पेट्रोल-डीजल के दाम घटाना कितना दुश्वार है, इसे सरकार, उसके मंत्रियों के बयानों और सूत्रों के अनुसार चलाई जाने वाली खबरों से से समझा जा सकता है। मसलन पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने देश को बताया कि हम मामले को लेकर ‘संवेदनशील’ हैं। सरकार अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम बढ़ने के कारण पेट्रोल और डीजल की भाव वृद्धि का दीर्घकालीन हल तलाशने को लेकर एक समग्र रणनीति अपनाने की योजना बना रही है। यह रणनीति कब और कौन बनाएगा, यह आज तक रहस्य है। इसके पहले कहा गया कि सरकार पेट्रोल- डीजल को जीएसटी में ला सकती है ताकि रेट कम हों। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने पत्रकार वार्ता में भरोसा दिलाया कि दाम कम होने ही वाले हैं, थोड़ा ठंड रखो।

फिर राज्यों को यह नेक सुझाव दिया गया कि हम तो नहीं घटा सकते तुम ही अपना टैक्स कम करके दिखाअो। राज्यों ने कहा कि जब आपमें ही हिम्मत नहीं है तो हम ऐसी रिस्क क्योंकर उठाएं ? पेट्रोल और डीजल की कीमतों को और तर्कसंगत बनाने के लिए इनके मूल्य निर्धारण तंत्र पर विचार करने का भी सुझाव आया। इसके तहत राज्यों को वेट ईंधन के आधार मूल्य पर कर लगाने की नेक सलाह दी गई। अभी यह केंद्र सरकार का कर जोड़ कर बनी कीमत पर लगता है। यदि ऐसा हो तो तो पेट्रोल 5.75 रुपए और डीजल 3.75 रुपए प्रति लीटर सस्ता हो सकता है। लेकिन इससे राज्यों को 34 हजार 627 करोड़ के राजस्व का नुकसान हो सकता है, जो उनके सम्मिलित राजस्व घाटे के 0.2 प्रतिशत के बराबर है। यही खतरा अगर केन्द्र सरकार ने उठाया और केन्द्रीय उत्पाद शुल्क 1 रूपया घटाने की हिम्मत दिखाई तो उसे 10 हजार 725 करोड़ का घाटा हो सकता है। वह यह क्यों उठाए ?

इस बीच सोशल मीडिया पर एक ‘समझाइश अभियान’ चला कि पेट्रोल-डीजल महंगा रहने से देश की शान कितनी बढ़ती जा रही है। यह साबित करने की कोशिश भी हुई कि अनाज गैस पर सबसिडी इसीलिए दी जा रही है जैसे कि शादी के भोज का खर्च आपके ‘व्यवहार’ के लिफाफे से एडजस्ट ‍िकया जा सके। कुछ चिंतकों ने यह सुझाव भी दिया कि ‘भक्तों’ और ‘अ-भक्तों’ के पेट्रोल डीजल के रेट अलग-अलग तय कर दिए जाएं ताकि किसी को कोई दिक्कत न हो। एक काउंटर ‍कैम्पेन भी चला कि यूपीए सरकार ने पेट्रोल डीजल बेतहाशा बढ़ने पर एक्साइज ड्यूटी कम कर लोगों को भारी राहत दी थी। मतलब घाटे का हलाहल सरकार पी गई थी और जनता के जेब को फटने से बचा लिया गया था।

बहरहाल मौजूदा सरकारें किसी तरह का कोई ‘हलाहल’ पीना नहीं चाहतीं। क्योंकि पिछली मनमोहन सरकार पेट्रोल सस्ता करके भी चुनाव हार गई थी। मोदी सरकार ने तेल के बढ़ते भावों पर हैंड ब्रेक लगाकर एक टेम्पेरेरी रिस्क कर्नाटक चुनाव के वक्त ली थी। लेकिन वहां भी वो सरकार नहीं बना पाई। ऐसे में अब भाव घटाकर भी क्या मिलना है? सरकार को पता है कि लोग पेट्रोल-डीजल के मुद्दे पर सिर्फ हाय तौबा करते हैं, वोट नहीं देते। जब वोट नहीं देते तो सरकार क्यों मगजमारी करे ? रहा सवाल चिंता का तो सरकार भावों को लेकर चिंता तब तक जताती रहेगी, जब तक दुनिया में इसके दाम गिर नहीं जाते।

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