नाशवन्त रिश्तें नाशवान वस्तुओं के कारण टूट जाते है: आचार्य ऋशभचन्द्रसूरि

पर्युषण पर्व आत्मा को जगमगाने का पर्व है। दीपावली लोकिक पर्व है, हम इसे भगवान महावीर के मोक्ष कल्याणक व गौतमस्वामी के केवलज्ञान के प्रसंग रुप में नववर्ष मनाते है। लेकिन पर्युषण पर्व लोकोत्तर पर्व है।

0
43
rishabhchandra suri

इन्दौर। दादा गुरुदेव की पाट परम्परा के अष्टम पट्टधर वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यदेवेश श्रीमद्विजय ऋषभचन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. ने कहा कि पर्युषण महापर्व की आराधना भी उसी प्रकार की है जिस प्रकार हम दीपावली पर साफ सफाई करके लक्ष्मी जी के आगमन का इन्तजार करते है ताकि लक्ष्मी जी व कुबेर जी का हमारे घर में प्रवेश आसानी से हो जाये। हम भौतिक लक्ष्मी के लिये तैयारियां करते है। पर्युषण पर्व आत्मा को जगमगाने का पर्व है। दीपावली लोकिक पर्व है, हम इसे भगवान महावीर के मोक्ष कल्याणक व गौतमस्वामी के केवलज्ञान के प्रसंग रुप में नववर्ष मनाते है। लेकिन पर्युषण पर्व लोकोत्तर पर्व है।

rishabhchandra suri

भारतीय परम्परा में त्यौहारों पर यदि परिवार में किसी पुरुष की मृत्यु हो जाये तो वह परिवार फिर कई वर्षो तक वह त्यौहार नहीं मनाता है जबतक कि उसी त्यौहार पर पुनः पुत्ररत्न की प्राप्ति न हो। व्यक्ति को अपने एक पल की खबर नहीं और सामान सौ बरस का इक्कठा कर लेता है। नाशवान वस्तुओं से, नाशवान शरीर से व नाशवन्त रिश्तों के कारण व्यक्ति मोह में डुबा रहता है। रिश्ते नाशवन्त वस्तुओं के कारण टुट जाते है। शाश्वत रिश्ते प्रभु से होते है, परमात्मा शाश्वत है। हमारा प्रेम परमात्मा से कम और धन से ज्यादा होता है। हम भी उसी को पकड़ते है जो जरुरत पूरी करता है। जरुरत पूरी हुई हमारे रिश्ते खत्म। स्वार्थ पर आधारित सम्बंध कभी भी शाश्वत नहीं होते पैसा जाने के बाद कोई किसी को नहीं पूछता है। पर्युषण महापर्व में प्रभु व गुरु प्रतिमा की पूजा अर्चना, सामायिक प्रतिक्रमण से सम्बन्ध कभी नहीं टुटता है। पर्युषण महापर्व पर अधिक से अधिक सामुहिक अट्ठाई करने का प्रयास करें। धर्म के साथ स्वयं को जोडे़, यही शाश्वत सुख प्रदान करेगा।

rishabhchandra suri

ज्ञानप्रेमी मुनिराज श्री पुष्पेन्द्रविजयजी म.सा. ने कहा कि हम सभी सुख की खोज में निकले है, हम घर की साफ सफाई तो करते है पर अपनी आत्मा पर लगे दोषो को दूर करने का प्रयास नहीं करते है। चाय पीते वक्त यदि कपड़ों पर चाय के दाग लग जाये तो चाय का कप रखकर पहले दाग धोते है फिर चाय पीते है। तो फिर अपनी आत्मा पर लगे हुये दागों को धोने का प्रयास क्यों नहीं करते है। हम दूसरों के प्रति द्वेष की भावना पालकर बैठे रहते है। जीवन में सच्चाई और सफाई होगी तभी हम पूर्ण रुप से सुखी हो सकते है। हमारे विचार अच्छे है तभी हमारा प्रदर्शन अच्छा रहेगा । शरीर को स्थिर करने की जरुरत नहीं है मन को स्थिर कर लेने से आत्मा का उद्वार सम्भव है।

rishabhchandra suri

संतों के मन हमेशा स्थिर रहते है और संसारियों के मन संसार में ही घुमते रहते है । सतयुग में भी कलयुग था पर कलयुग में सतयुग का निर्माण इंसान ही कर सकता है। बच्चों में धार्मिक प्रवृति डालना जरुरी है तभी बच्चों में अच्छे संस्कारों का सींचन सम्भव होगा। दादा गुरुदेव की आरती श्री नरेन्द्र वासु जी पीतलीया परिवार द्वारा उतारी गयी। आज की साधार्मिकभक्ति, प्रभावना व लक्की ड्रा का लाभ कांताबेन नन्दलालजी रांका परिवार वल्लभ नगर इन्दौर वालों ने लिया।

rishabhchandra suri

दादा गुरुदेव की पाट परम्परा के अष्टम पट्टधर वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यदेवेश श्रीमद्विजय ऋषभचन्द्रसूरीश्वरजी म.सा., ज्ञानप्रेमी मुनिराज श्री पुष्पेन्द्रविजयजी म.सा., मुनिराज श्री रुपेन्द्रविजयजी म.सा., मुनिराज श्री जिनचन्द्रविजयजी म.सा., मुनिराज श्री जीतचन्द्रविजयजी म.सा., मुनिराज श्री जनकचन्द्रविजयजी म.सा. एवं सेवाभावी साध्वी श्री संघवणश्री जी म.सा. आदि ठाणा की पावनतम निश्रा में यशस्वी चातुर्मास चल रहा है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here