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चुनाव का महासमर और कीचड़ में फंसी कर्ण रूपी जनता

Posted on: 19 May 2018 16:35 by Lokandra sharma
चुनाव का महासमर और कीचड़ में फंसी कर्ण रूपी जनता

“अनुराग शर्मा” फ्रीलान्स जर्नलिस्ट

चुनाव के बाद किसी ऐसे व्यक्ति को पद पर बैठाना क्या उन लोगों की बुद्धि का घोर अपमान नहीं है जिन्होंने उस व्यक्ति को नहीं चुना है?

हमारे देश की राजनीति दरअसर शुरुआत से ही जनता को मूर्ख समझती आ रही है।

कैसे?

चुनाव के नियम किसने बनाए?……….. नेताओं ने….. प्रक्रिया का निर्धारण किसने किया?…. नेताओं के मार्गदर्शन में अधिकारियों ने….चुनावों की तिथि कौन तय करता है?…………. सरकारें। चुनाव कैसे होंगे ये भी नेता ही तय करते हैं? चुनाव में जनता किसे चुने ये कौन तय करता है? फिर से नेता ही।

इन सब में जनता बेचारी कहां है? जिन लोगों को वोट देना है कम से उनसे से तो पूछा जाए कि भाई आपको फलां व्यक्ति पसंद है या ढिमका व्यक्ति? अपने नेता के रूप में आप किस व्यक्ति को हमारी पार्टी की ओर से टिकट दिलवाना चाहते हैं

जनता के पास तो एक ही शक्ति है वोट देने की, लेकिन चुनाव में जनता की स्थिति तो महासमर में फंसे कर्ण के समान हो जाती है। हाथ में ब्रह्मास्त्र तो है लेकिन रथ का पहियां कीचड़ में फंसा है, उसके कवच-कुंडल पहले ही छले जा चुके हैं और उस पर भी ब्रह्मास्त्र चलाने की विद्या वो भूल चुका है।

उपाय तो फिर एक ही बचता है, जो सामने नज़र आए उसे ही नेता मान लेगा बेचारा।

आजादी के बाद देश में चुनावों का औसत निकाला जाए तो लोकसभा और विधानसभाओं के अब तक करीब 350 से ज्यादा बार चुनाव हो चुके होंगे। इतने साल और चुनावों के बाद भी परिवर्तन के नाम पर क्या हुआ है? महज़ ये कि बैलेट बाॅक्स की जगह ईवीएम दिखने लगी है। बाकि तो सब वैसा का वैसा ही है।

नेताओं ने मतदाता के सामने सिर्फ मजबूरियां ही छोड़ी है, सारी स्वतंत्रताएं खुद के लिए रखी। क्या ऐसा नहीं होना चाहिए कि राजनीतिक पार्टियों के लिए भी ऐसे नियम रखे जाएं जो उन्हें मजबूर करे? जनता ने किसी को भी अपना नेता नहीं चुना है तो आप मजबूरन किसी को भी उन पर थौंप नहीं सकते। या तो आप चुनाव जीतिए या फिर उस राज्य की कमान सेना को सौंप दी जाएगी या राष्ट्रपति शासन लगाया जाएगा। ये बगैर शर्त होगा किसी भी जोड़-तोड़ या खरीद फरोख्त के बगैर। साीधे-सीधे दूसरे उपाय का चुनाव।

इससे होगा ये कि शायद कि राजनीतिक पार्टियां कम से कम सोचने पर तो मजबूर होंगी कि ऐसा क्या किया जाए जिससे लोग हमारी पार्टी या व्यक्ति को स्पष्ट रूप से चुनेें। जनता के पास तो ये भी उपया नहीं कि वे अपनी बातों या विरोध को पार्टियों तक पहुंचा सकें। जब तक राजनीतिक चुनावों को सुधारा नहीं जाएगा जब तक नाटक तो चलते रहेंगे और जनता सिर्फ की तरह इन्हें देखती रहेगी।

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