फिल्म कबीर सिंह के लिए पदमा राजेंद्र की समीक्षा

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पूरा सिनेमाहाल युवक- युवतियों से भरा पड़ा था टिकट विंडो पर अपनी-अपनी गर्ल फ्रेंड का हाथ पकड़े जोर-जोर से बातें – हंसी मजाक करते युवक सिनेमा हॉल में जब गूंगी गुड़िया सी हीरोइन को देखते ही सीटी बजा कर शोर मचाते कहने लगे यार बीबी तो ऐसी ही चाहिए। तो मैं मुस्कुराए बिना न रह सकी। पुरुष की सामंतवादी सोच पर, जिसे गर्लफ्रेंड तो आधुनिका व स्मार्ट चाहिए पर बीबी गूंगी गुड़िया।

इतनी चुप खामोश डॉक्टरी पढ़ने वाली लड़की तो शायद बिरली ही होगी जो कैंपस में हीरो के द्वारा दूसरी ही मुलाकात में दिए गए किस का कोई प्रतिकार नहीं करती। क्लास छोड़कर हीरो के कहने पर रोज-रोज उसके साथ चली जाती।

कबीर को बचपन में सफेद कपड़ों वाली अपनी गुड़िया बहुत पसंद थी, वह हमेशा उसे अपनी छाती से लगाकर रखता था, एक बार गुड़िया खो गई ,कबीर ने सारा घर सर पर उठा लिया ,दादी कहती है और दादी के द्वारा बचपन की कहीं इस बात ने ही पूरी कहानी में विस्तार लिया है।

कॉलेज छोड़कर जाता कबीर सफेद कपड़ो वाली लड़की के प्यार में आकंठ डूब जाता है, इतना डूबता है कि मौत के मुंह से वापस आता है। कबीर का प्यार मैं इतना डूबना हर उम्र के दर्शकों को लुभाता है ,उसका इतना पजेसिव होना व पूरे कॉलेज में एलान करना की कोई उस लड़की की तरफ आंख उठाकर ना देखें भला लगता है। अपनी चुन्नी ठीक करो कि हिदायत भी बुरी नहीं लगती। सबसे ज्यादा रोमांच तब फील होता है जब हर मुलाकात में कबीर उसके कंधे पर टंगा बैग बिना बोले, बिना कुछ कहे, अपने कांधे पर ले लेता ह। वह एक जेंटलमैन है वाली फिलिंग मुझे फिल्म से बांधे रखती ह। कबीर के रूप में प्यार ,गुस्सा ,कद्र ,पर ‘वाह‘ करने वाला हर रूप निखर कर आता है। निर्देशक ने एंग्री यंगमैन पर फोकस किया है पर उसके तमाम दूसरे पहलू भी उतनी ही गहराई से दिखाए हैं कि दर्शक बंधा रहता है।

भाई- भाई का प्यार फिल्म की जान है, भाई के लिए भाई का खड़ा होना, घर चलने ,नशा न करने के लिए उस पर हाथ उठाना ,उसकी फिक्र करना ,सब कुछ फिल्म को अल्हदा बनाती है। दादी के प्रति कबीर का अनुराग, दादी का स्नेह ,संयुक्त परिवार की मिसाल है। पिता का पुत्र के लिए हमेशा खड़े होना, उसे घर से निकाल कर दिन- गिनना ,दादी की मृत देह को बॉडी किसी के कहने पर कबीर का भड़कना उनकी तस्वीर से हार उतारकर रिकॉर्ड प्लेयर पर दादी का पसंदीदा गाना बजाना …दर्शकों का दिल भारी कर आंखें नम कर देता है।

कबीर सिर्फ प्रेमिका के लिए ही नहीं ,बल्कि अपने परिवार के प्रति भी फिक्रमंद है। दादी की मौत पर पिता को बाहुपाश में लेना व उनके लिए फिर से जी उठना… हर पल दर्शक बंधा रहता है।
कबीर पर जान लुटाता दोस्त अगर उसकी बात ना करेंगे तो फिल्म अधूरी रह जाएगी ऐसा दोस्त जो अपने दोस्त पर जान लुटाने को तत्पर रहें, उसे हरदम पीने के लिए मना करने वाला दोस्त ,पेशी के लिए नशे में बेसुध दोस्त को ब्राउन शुगर इसलिए चटाता है कि उसका दोस्त अपना बयान दे सके। उसकी डिग्री न छिने… अपने दोस्त की सारी हकीकत जानने के बाद भी उसे संभालने के लिए अपनी बहन की शादी का प्रस्ताव लेकर आना फिल्म में जान फूंकता है।

सारे कलाकारों ने बहुत अच्छा काम किया है कबीर सिंह के रूप में शाहिद ने खूब मेहनत की है उनका अभिनय बेमिसाल है। एक डॉक्टर का इतना नशा करना ऑपरेशन करते वक्त नशे में धुत रहना गाली -गलौज के बिना भी फिल्म अच्छी बन सकती थी।

मर्दानगी दिखाने के लिए गुस्से में गाली गलौज करना, एक दूसरे को पीटना, सेक्सुअली चार्ज होने पर अपनी पैंट में आइस क्यूब डालना चाकू की नोक पर सेक्स की कोशिश करना। दोस्त को लड़की के बारे में कहना फिजिकल रिलेशन बनाने की बात करना जितना भोंडा लग रहा था उससे ज्यादा घिनौना ऐसे दृश्यों में थिएटर में बैठे लड़कों का रिएक्शन लग रहा था, एक हिंसक हीरो है कबीर तो निष्ठावान प्रेमी भी, उसे हिंसक रूप देने की जरूरत क्यों पढ़ी। इसका बस एक ही जवाब सूझता है टीआरपी का चक्कर।

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