20 हजार फुट की ऊंचाई, माइनस 60 डिग्री तापमान, सियाचीन में ऐसे तैनात रहते है हमारे जवान

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नई दिल्ली: दुनिया की सबसे रणभूमि, जहां हमारे सैनिक 20 हजार फुट की ऊंचाई पर मातृभूमि की रक्षा के लिए तैनात रहते है। शून्य से 60 डिग्री नीचे कम तापमान और बर्फीली हवाएं भी हिंदुस्तान के सैनिक का हौसला कम नहीं कर पाती। यहां हमारे जवान कितनी मुश्किल में रहते है इस बात का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकते है कि पिछले 30 सालों में हमारे 846 जवानों ने प्राणों की आहुति दी है।

रस्सी से बंधे होते है पैर

चारोतरफ बर्फीले पहाड़ और बेहद खराब मौसम होने के बावजूद 10 हजार सैनिक इस छोटी पर डेरा जमाए हुए है। यहां सैनिक एकसाथ चलते हैं। समूह में चलने वाले सैनिकों के पैर रस्सी से बंधे होते है ताकि यदि किसी साथी का पाँव फिसले तो वह नीचे नहीं गिरे और अलग ना हो पाए। यहां सैनिक हर परिस्थिति का सामना करने को तैयार रहते है।

बेहद खतरनाक मौसम के बावजूद देश के 10 हजार जवान इस बर्फीली चोटी पर दिन रात डेरा जमाए रहते हैं और दुश्मन देश के नापाक मंसूबे को नाकाम करते हैं.

10 दिन का लगता है समय

सियाचीन ऐसी बॉर्डर है जहां सैनिकों को सुश्मानों से ज्यादा मौसम का खतरा बना रहता है। यहां जिस जगह जवानों की तैनाती होती है वहां पहुँचने के लिए बेस कैंप से 10 दिन पहले यात्रा शुरू करनी पड़ती है। सैनिक अपनी यात्रा रात में शुरू करते है क्योकि रात में बर्फ धंसने का खतरा कम रहता है।

यहां हर फौजी की पीठ पर 20 से 30 किलो का बैग होता है, जिसमें बर्फ काटने वाली एक कुल्हाड़ी, उसके हथियार और रोजमर्रा के कुछ सामान होते हैं। इतना कम तापमान होने के बाद भी सैनिक पसीने से तरबतर रहता है। शरीर पर 6-7 तह मोटे और गर्म कपड़े होते हैं। सैन्य पोस्ट तक पहुंचते पहुंचते शरीर और कपड़े के बीच पसीना बर्फ की पतली परत में जम जाता हैं।

खाने में सिर्फ लिक्विड

इस खतरनाक चोटी पर जवानों के खाने में लिक्विड ज्यादा उपयोग होता है। खाने का सामान टीन के कैन में सप्लाई होते हैं। यदि सूप पीना होता है तो पहले उसे पिघालना पड़ता है। दूध की कैन को खोलने में 40 मिनट तक का वक्त समय लग जाता है क्योंकि हाथ इतने बंधे होते हैं और उस पर कपड़े की इतनी मोटी तह होती है कि डिब्बे को पकड़ना इतना आसान काम नहीं होता।

सैनिकों को खाने के लिए चॉकलेट और सूखे मेवे सैनिकों के लिए काफी मुफीद माने जाते हैं क्योंकि वो बर्फ में जमते नहीं और जम भी जाएं तो उन्हें पिघलाने की जरूरत नहीं पड़ती। पीने से पानी के लिए कोई सुविधा नहीं होता। यहां सैनिकों को बर्फ पिघालकर ही पीना पड़ती है।

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