Breaking News

विपक्ष प्रजातंत्र मोदी, एन के त्रिपाठी की जबरदस्त टिप्पणी

Posted on: 25 May 2018 04:22 by Ravindra Singh Rana
विपक्ष प्रजातंत्र मोदी, एन के त्रिपाठी की जबरदस्त टिप्पणी

बंगलुरू में कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह के अवसर पर एक दर्जन दिग्गज विरोधी दल के नेताओं का एक साथ मंच पर हाथ उठाते हुए दिखाई देना कोई साधारण घटना नहीं है।यह मोदी के भारतव्यापी यज्ञ के अश्व को पकड़ कर उन्हें खुली चुनौती देने वाला स्पष्ट संकेत है।बीजेपी का इससे सहम जाना स्वाभाविक है परन्तु उसने अभी तक निश्चिन्तता का आवरण ओढ़ रखा है।उसे मालूम है कि उसकी विशाल ताक़त के सामने देर सबेर विपक्ष का एकजुट होना अवश्यंभावी है।

2014 मे 31% मतों के साथ 282 सीटें लोकसभा मे लाकर मोदी ने देश विदेश में लोगों को चौंका दिया था।विपक्षी वोटों के बँटवारे से जैसे नतीजे उ प्र में आये वे बीजेपी के लिये भी अप्रत्याशित थे। तमाम क्षेत्रीय विपक्षी दल हताश हो गये और शिवसेना जैसे मित्र दल सशंकित हो उठे। महान राष्ट्रीय काँग्रेस पार्टी सिकुड़ कर हाशिये पर चली गई।इसके बाद कुछ राज्यों को छोड़ कर बीजेपी पूरे देश मे फैल गई।मोदी ने चुनाव सभी वर्गों को सुनहरा भविष्य ( अच्छे दिन) दिलाने के वादे पर जीता था। ‘ सबका साथ सबका विकास’ का नारा लोगों के दिलों को छू गया था ।

मोदी ने सरकार में उत्साह से काम शुरू किया जो UPA II के अति भ्रष्ट और लकवाग्रस्त शासन के बाद एक ठंडी हवा के झोंके के समान था। विपक्ष ने इसकी काट निकाली— राज्य सभा मे जहाँ उसका बहुमत था उसे पूरे समय ठप्प कर दिया । मोदी ( या भारत) के आर्थिक सुधार के दो महत्वपूर्ण खम्भे— श्रम एवं भूमि सुधार— राज्य सभा मे धाराशायी हो गये। राज्य सभा ने बीजेपी का एजेंडा पूरी तरह रोक दिया। GST और Insolvency and Bankruptcy Code को छोड़ कर राज्य सभा ने कुछ नहीं किया। लोकसभा को अकेले ही आधार बिल को मनी बिल बता कर पास करना पड़ा।मोदी ने नोटबन्दी जैसे निरर्थक क़दम केवल अपनी शक्ति दिखाने के लिये उठाये।बीजेपी गोहत्या जैसे विभाजनकारी मसलों को हवा देने मे लग गयी।

कर्नाटक रंगमंच की सूत्रधार सोनिया गांधी है जो आज भी विपक्षी दलों के लिये विश्वस्त चुम्बकीय केन्द्र है। जिस फुर्ती से उन्होंने जेडीएस को समर्थन देने की घोषणा की वह प्रशंसनीय है। बीजेपी की बढ़त को नकार कर उन्होंने न केवल कुमारस्वामी की सरकार बनवाई बल्कि सभी विपक्षी दलो की एकता का मार्ग भी प्रशस्त किया। विपक्षी दलों मे ग़ज़ब का आत्म विश्वास जागा है। उनके लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण सपा और बसपा का साथ आना है जिन्होंने गोरखपुर और फूलपुर जीत कर कमाल कर भविष्य का मार्ग दिखाया है।विपक्ष की राह मे अभी भी कुछ स्पीड ब्रेकर हैं।

लेफ़्ट और आरजेडी तो कांग्रेस के आगे नतमस्तक है परन्तु ममता तथा अनेक अन्य क्षेत्रीय नेता राहुल गांधी का नेतृत्व नहीं चाहते हैं । उनका सोचना है कि राहुल केवल परिवार के नाते नेता है और उनमें नेतृत्व के सहज गुण नहीं हैं । दूसरे उनका कहना है कि कांग्रेस अब एक छोटी पार्टी रह गयी है। कांग्रेस दूरी बनाकर उन्हें लगता है कि वे अधिक सीटें ला सकते हैं। उनकी अन्दरूनी रणनीति यह है कि विपक्षी क्षेत्रीय दल एकजुट होकर कांग्रेस से अधिक सीटें लाकर प्रधानमंत्री का दावा कर सकें। यह भविष्य ही बतायेगा कि क्या ये क्षेत्रीय विपक्षी दल अपना कोई एक नेता चुन सकेंगे । कांग्रेस की रणनीति होगी कि ऐसा न हो सके।

२०१९ का चुनाव अब काँटे का होने की सम्भावना है तथा परिणाम कुछ भी हो सकते हैं।हर लोकसभा चुनाव की तरह यह भी हमारे प्रजातंत्र के लिये ऐतिहासिक होगा। चुनाव GST, नोटबन्दी, Start up, Skill India , GDP, पेट्रोल के दाम या किसान समस्या आदि के आधार पर नहीं लड़ा जायेगा । सभी दल इन मुद्दों की बात तो करेंगे परन्तु इनका प्रभाव आंशिक होगा। चुनाव मुख्यत: केवल धर्म और जाति के आधार पर लड़ा जायेगा। सभी दल धर्म और जातियों को महीन पीस कर चलनी मे चला कर अपने हिसाब से चुनाव लड़ेंगें ।

मोटे तौर पर एक तरफ़ अल्पसंख्यक , पिछड़े वर्ग की सम्पन्न जातियाँ तथा सक्रिय दलित जातियाँ होंगीं। इसका उल्टा ध्रुवीकरण बीजेपी की तरफ़ होगा- सवर्ण, पिछड़े वर्ग की निम्न जातियाँ तथा निम्न दलित । दोनों पक्ष एक दूसरे के समूह मे सेंध लगाने का प्रयास भी करेंगे। सभी पार्टियाँ अपनी बात इसी छिपे एजेंडे के आधार पर करेंगी।उदाहरणस्वरूप एक पक्ष धर्मनिरपेक्षता की बात करेगा परन्तु जातिगत विद्वेष को हवा देगा। बीजेपी खुलकर साम्प्रदायिक तनाव बढ़ायेगी और पिछड़े वर्ग में कई वर्गीकरण कर निचले स्तरों पर २७% मे से उन्हें पृथक आरक्षण देने का प्रयास कर सकती है।

धर्मों और जातियों के इन दो समूहों के अतिरिक्त भी एक भारत है जो तराज़ू के पलड़े को किसी भी तरफ़ झुका सकता है। इस सन्दर्भ में मोदी का विशेष महत्व है। मोदी की विश्वसनीयता एवं लोकप्रियता अभी भी बनी हुई है। उनके क़द का कोई नेता विपक्ष के पास नहीं है। भारतीयों के जनमानस मे देश की गम्भीर अव्यवस्था को देखते हुए एक शक्तिशाली नेता की चाहत हमेशा रहती है जो कड़े निर्णय ( सही या ग़लत) लेने का साहस रखता हो। इसके अतिरिक्त २०१९ मे २०१४ की तरह एक बार फिर शहरी शिक्षित युवा वर्ग की भूमिका निर्णायक होगी। यह भूमिका संख्या पर नहीं बल्कि जनमत बनाने पर आधारित होगी।
देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय लोकतंत्र तमाम शोरगुल के बीच अपना रास्ता कैसे और किधर निकालता है।

 एन के त्रिपाठी

Latest News

Copyrights © Ghamasan.com