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कुल्फी के ठेलों की तो बस यादें ही बची है

Posted on: 12 Mar 2019 10:42 by Mohit Devkar
कुल्फी के ठेलों  की तो बस यादें ही बची है

समीर शर्मा के सौजन्य से

टिन टिन, टिन टिनिन टिन…
कुछ याद आया, गर्मी की रातों में कॉलोनी की सड़कों पे देसी डेज़र्ट किंग आया करते थे, कुल्फी लेकर….मटका कुल्फी…दो बड़े मटके उसपर लाल कपड़े का कवर, 2 बड़े स्पीकर्स और डेक पे चलती कैसेट्स के सुपरहिट गाने और एक साइड में रखी बैटरी जिससे ट्यूबलाइट और टेप चला करती थी।

केसर , बादाम, आम और रबड़ी फ्लेवर में….शर्तों का ईनाम हुआ करती थी कुल्फी, बच्चों की ज़िद का सामान होती थी कुल्फी, दिनभर गर्मी के बाद का सुकून भर इंतज़ार होती थी ये कुल्फी और इनके ठेले…

इनके नाम बड़े खूबसूरत, दिलकश और रोचक होते थे, कोई खालिस उर्दू में मौसमे बहार, गुल-गुलशन-गुलफाम , लब ए बहार लिखता था, तो कोई मयूर-मीनाक्षी, ऋतुराज तो कोई जल्दीबाज़ी में रमेश-सुरेश- दिनेश भी…

आपको याद है कोई नाम?

अब बहुत कम दिखते हैं ये खुशियों की कुल्फी के ठेले , क्योंकि हमारे पास हैं शहर , मोबाईल और टीवी के झमेले….

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