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जिस्मफरोशी के हाईवे पर एक रात बतौर ‘टीवी पत्रकार’ पुष्पेन्द्र वैद्य की कलम से

Posted on: 20 May 2018 08:34 by Ravindra Singh Rana
जिस्मफरोशी के हाईवे पर एक रात बतौर ‘टीवी पत्रकार’ पुष्पेन्द्र वैद्य की कलम से

साल 2010, अक्टूबर महीने का आखरी हफ्ता… स्टेट हाईवे नंबर31… मौसम में घुलती गुलाबी ठंड…130 किलोमीटर लंबा चमचमाता हाईवे…हाईवे पर पडने वाले गांव और कस्बों के बीच टिमटिमाती रोशनी वाले कच्चे-पक्के छोटे-छोटे कमरेनुमा मकान…मकानों के बाहर सडक चलते लोगों को ध्यान खींचने कर जिस्म की नुमाईश करने वाली लडकियाँ…

दूर तक हाईवे के दोनों किनारे पर छोटे-छोटे स्लीवलेस टॉप और टाईड जींस से कसे बदन में शाम ढलते ही सज-धज कर बैठती लडकियाँ जिस्म की इस मंडी को आबाद कर देती हैं…स्याह अंधेंरे में जैसे-जैसे रात गहराती जाती है, हाईवे किनारे अलाव की रोशनी में इनकी देह दमकने लगती है…गहराती रात के साथ जिस्म का बाज़ार और भी जोर पकडने लगता है…लडकियाँ रास्ते से गुजरने वालों को हाथ का इशारा कर बुलावा देती हैं…गुमटीनुमा दुकानों के बाहर शामिल लडकियाँ भी अपने खास ग्राहकों के साथ महंगी शराब के घूँट भरती जा रही है …

दरअसल किसी फ़िल्मी स्क्रिप्ट की तरह लगने वाला यह दृश्य सौ फीसदी हकीकत है मध्यप्रदेश से राजस्थान को जोडने वाले स्टेट हाईवे नंबर 31 पर रतलाम से नीमच के बीच की। रतलाम-नीमच और मंदसौर में रहने वाली बांछडा जनजाति में यह कुप्रथा सालों से चली आ रही है। इस समुदाय में आज भी लडकियाँ अपने परिवार के सामने मर्दों को खुलेआम अपना जिस्म बेचती है और उनके परिवार के मर्द उनकी कमाई के भरोसे हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं। कुछ तो दलाली तक करते हैं। यहाँ लडकियाँ पैदा होने पर खुशियाँ बांटी जाती है, ताकि उससे आगे चलकर धंधा कराया जा सके.

आखिर ये कैसी परंपरा है…कब से चली आ रही है…किस खास ढंग से जिस्म की देखभाल के साथ होती है यहाँ बेटियों की परवरिश…क्या ये मजबूरी है या फिर सिर्फ़ कुप्रथा…कैसे उतारा जाता है उन्हें इस दलदल में…बेटियों के नाम पर चिंता का दिखावा करने वाली सरकार ने क्यों आंखों पर काली पट्‌टी बांध रखी हैं…क्या समाज की कोई जिम्मेदारी नहीं है…ऐसे तमाम सवालों को लेकर एक स्टोरी आईडिया दफ्तर को भेजा ही था कि थोडी देर में फोन की घंटी बजी…ये वीकेंड स्पेशल स्टोरी है…तुरंत निकल जाओ…दो दिन में स्टोरी चाहिए…इसमें वह तमाम सारे शॉट्स होना चाहिए जिसमें लडकियाँ जिस्म की नुमाईश करते दिख रही हो…छुपे कैमरे पर लडकियों के पास जाना होगा…उनसे बातें करना होगी…हमे फरमान मिल चुका था।

शाम ढलने से पहले हम रतलाम-नीमच के बीच इस हाईवे पर पंहुच चुके थे। लडकियाँ चमचमाते हाईवे पर इंडो-वेस्टर्न ड्रेस में अपने डेरो के बाहर झुंड में मंडराती दिख रही थी। कॉस्ट्यूम के साथ स्पेशल हेयर कट, कॉस्मेटिक और मोबाइल फोन का दबदबा भी दिखाई दे रहा था। कैमरामेन ने कार में कैमरे ऐसे सेट कर दिए थे कि किसी को दिखाई ना दे। आज की पूरी रात हमे इसी हाईवे पर गुजारना थी…आज इस हाईवे की एक-एक तस्वीर हमें कैमरे में कैद करना थी और वह भी बगैर किसी भनक के…छोटी-सी भनक भी हमारे लिए मुसीबत का कारण बन सकती थी। इनके दलाल बड़े शातिर होते हैं। गाडी पर से टीवी चैनल के स्टीकर हटा लिए गए थे…

हमारे सहयोगी आकाश चौहान और दिनेश नलवाया ने हमें कई हिदायतें भी दे रखी थीं। दोनों साथियों के मुताबिक किसी भी लडकी को कैमरे की भनक लग गई तो दूर-दूर तक लडकियाँ घरों में दुबक जाएगीं…फिर कितनी भी कोशिश कर लो, बाहर नहीं निकलेगीं। मंदसौर से आगे मल्हारगढ और पिपलिया मंडी के पास के डेरों में कतार से कई-कई लडकियाँ अपने ग्राहकों का इंतजार कर रही थी। रात करीब 12 बज रहे थे। कहीं डेरों के बाहर अपने ग्राहकों के साथ शराब गटकी जा रही थी तो कहीं मौज-मस्ती…डिम लाईट वाले कमरों से बाहर निकलते हुए खुशनुमा चेहरे भी कैमरे की रील पर चढ रहे थे।

यहाँ ज्यादातर लडकियाँ 14 से 20-22 साल की थी। हमारी कार रुकते ही लडकियों का पूरा झुंड कार की विंडों पर झूम गया। हमने उनसे बातें शुरु की…कुछ लडकियाँ तो हाथ पकडकर भीतर चलने की जिद करने लगी…एक लडकी से बातों ही बातों में यह साफ हो गया था कि ये धंधा परम्परा के नाम पर कई सालों से चला आ रहा है। 14-15 साल की उम्र में पहली बार उसकी बोली लगा कर किसी धन्नासेठ को सौंप दी जाती हैं। उसके साथ पहली रात गुजारने के बाद तो जितनी रातें उतने मर्द…लडकियों के भीतर की सारी संवेदनाएँ खत्म हो जाती है…ये सिर्फ़ उनके लिए एक धंधा बन जाता है…हमने एक लडकी से पूछा कि यहाँ पुलिस वालों का कोई टेंशन तो नहीं है…जवाब मिला टूकडे डाल देते हैं साहब…जिस्म बेचकर उन्हें भी हफ्ता चुका देते हैं…ये सारी बातें किसी दोस्त या ग्राहक की तरह से ही की जा रही थी…

इसी बीच पुलिस की गाडी वहाँ आ पंहुची…कौन हो बे…अच्छा पूरे चार-पांच लोग हो…चलो थाने चलो…लेकिन हम तो यहाँ खडे होकर बात कर रहे हैं, हमने क्या ग़लत किया है…हमने गुजारिश की…चलो थाने ले चलो इन्हें सब समझ आ जाएगा…कल अखबार में शक्लें छपेगी तो सवाल-जवाब भूल जाएगें…हमे जानकारी मिली थी कि पुलिस वाले रात में एक-दो बार आते हैं और पकडे गए लोगों से वसूली कर लेते हैं। जो जैसा मिलता है उसे वैसे काट लिया जाता है… इस बइस से पहले तक लगभग तमाम सारी तस्वीरें हम अपने कैमरे में कैद कर चुके थे। हम थाने पंहुचे और थानेदार के सामने पेश किए गए. थानेदार के चेहरे पर गमछा पडा हुआ था और वह आधी नींद में ऊंघ रहा था…

पुलिसवालों ने कहा साहब ये लोग एक तो डेरे से पकडे गए, ऊपर से मुंहजोरी कर रहे हैं। हमारी कुछ और पूजा या लानत-मलानत होती उससे पहले मैंने उन्हें विनम्रता से अपना परिचय दिया और गाडी में लगे कैमरों के बारे में भी बताया…मैंने कहा कि हम कल इस मामले में एसपी साहब से भी मिलेंगे और आपसे भी। टीआई ने माजरा समझ लिया और हमे चाय पिला कर नीमच तक उन्हीं पुलिस वालों की गाडी से छुडवा दिया। नीमच पंहुचते-पंहुचते भुनसार हो चुकी थी। कुछ देर पहले हमे झिडकी देकर रौब गांठने वाले पुलिस जवान अब हमें इन लडकियों के बारे में तरह-तरह की जानकारियाँ दे रहे थे।

अगले दिन हमने जिम्मेदार पुलिस अफसरों, समाज के लोगों, एनजीओ, सरपंच, समाज के मुखिया और कुछ इसी समाज की अधेड औरतों से भी इंटरव्यू किया। हमने पूरी कोशिश की कि स्टोरी में इस सामजिक बुराई वाली कुप्रथा के साथ सरकार, जिम्मेदार अफसर, पुलिस और स्वंयसेवी संस्थाओं की भूमिका भी तय हो। इस कुप्रथा को बंद करने के लिए सरकार और समाज के सामूहिक प्रयास क्या होना चाहिए, यह भी इस पूरी खबर का एक हिस्सा बना कर तैयार किया गया। जिस्मफरोशी करने वाली लडकियों के अलावा खबर में और भी कई एलिमेंट शूट किए गए थे।

अगले दिन हमने पूरा शूट लीज लाईन के जरिये अपने हेड ऑफिस भेज दिया। दफ्तर ने अगले ही दिन प्राईम टाईम के लिए स्पेशल स्टोरी तैयार की। ‘जिस्मफरोशी का हाईवे’ के नाम से प्रोमो चलाया गया। तीन सेगमेंट यानी पूरे आधे घंटे चलने वाली इस खबर को तीन हिस्सों में बांटा गया। शुरुआती दो सेगमेंट देखकर ऐसा लगा मानों हम इस सामाजिक बुराई की खबर को दिखाने के बजाए इस हाईवे को प्रमोट कर रहे हों…पूरी स्क्रिप्ट को तोडमरोड दिया गया था। लडकियों के जिस्म को दिखा-दिखा कर आखिर हम ये कौन-सी पत्रकारिता करना चाहते हैं। हैरानी की बात ये थी कि आधे घंटे के स्पेशल शो में जिम्मेदारों में सिर्फ़ पुलिस के अलावा किसी का जिक्र तक नहीं किया गया। जाहिर है टीआरपी इसी शो से मिली थी।

उस रात मैं देर तक सोचता रहा कि क्या इस तरह खबरें दिखाकर हम समाज की बुराइयों से मुठभेड़ कर सकते हैं। क्या एक पत्रकार की भूमिका सिर्फ़ किसी बड़े सामाजिक या ज़मीनी मुद्दे को एक बार किसी तरह टीवी के पर्दे पर या अखबारों के चमकीले पन्ने पर ला देने तक ही सीमित है। ऐसा कैसा है हमारे लोकतंत्र का चौथा प्रहरी।

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पुष्पेन्द्र वैद्य

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