महाराष्ट्र में पिछले कई महिनों से लगातार शिवसेना पार्टी के दोनों गुटों में तनातनी का महौल बना हुआ है। इस बार दोनो गुट की पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर महौल गरमाया हुआ है। इसी लड़ाई के बीच उद्धव ठाकरे को टार्च और मशाल वाला चिन्ह दे दिया गया है तो वहीं पार्टी का नाम शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे रखा गया है। लेकिन एकनाथ शिंदे से चुनाव आयोग ने अबतक 3 विकल्प मांगे हैं। उसी के आधार पर उन्हें चुनाव चिन्ह दिया जाएगा।

एकनाथ को मिला ये नाम

मिली सूचान के अनुसार, एकनाथ शिंदे गुट को Balasahebchi Shiv Sena नाम दे दिया गया है। लेकिन उनका चुनावी चिन्ह अभी तक तय नहीं हुआ है। वैसे चुनाव आयोग ने ये फैसला उस समय लिया है जब चुनाव चिन्ह वाली लड़ाई दिल्ली हाई कोर्ट पहुंच गई है। सोमवार को ही उद्धव ठाकरे की तरफ से दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। उस याचिका के जरिए चुनाव आयोग के उस फैसले का विरोध किया गया है, जहां पर शिवसेना के चुनाव चिन्ह को फ्रीज कर दिया गया था।

चुनाव आयोग ने दिए तीन विकल्प

एकनाथ शिंदे गुट की तरफ से चुनाव आयोग को पहले तीन विकल्प दिए गए थे। लेकिन चुनाव आयोग ने उन तीन विकल्पों में से दो को तो रिजेक्ट कर दिया, वहीं तीसरा वाला क्योंकि डीएमके के चुनाव चिन्ह से मेल खा रहा था, ऐसे में उसे भी स्वीकार नहीं किया गया। शिंदे खेमे की तरफ से त्रिशूल, गदा और उगते सूरज चुनावी चिन्ह के लिए भेजे गए थे। लेकिन चुनाव आयोग ने त्रिशूल और गदा को धार्मिक बताया और उगते सूरज को डीएमके का चुनावी चिन्ह। ऐसे में अब दोबारा शिंदे गुट को चुनाव आयोग को तीन विकल्प भेजने पड़ेंगे।

शिवसेना के वर्चस्व के बीच जंग

इस समय महाराष्ट्र की राजनीति में सिर्फ मुद्दे अलग रहते हैं, लेकिन उद्धव बनाम एकनाथ शिंदे की जंग तीखी होती जा रही है। इसकी शुरुआत तो सत्ता परिवर्तन के साथ हो गई थी जब उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ गया। लेकिन इसके बाद शिवसेना के वर्चस्व को बचाने वाली जंग ने भी तनाव कम करने का मौका नहीं दिया। अब उस सब के ऊपर चुनाव चिन्ह वाली लड़ाई ने विवाद को और ज्यादा बढ़ाने का काम किया। अभी के लिए दोनों उद्धव और शिंदे कैंप को ना शिवसेना नाम दिया गया है और ना ही वो वाला चुनाव चिन्ह मिला है।

इससे पहले शिवाजी पार्क में दशहरा रैली को लेकर भी उद्धव और शिंदे के बीच में एक लंबी कानूनी लड़ाई देखने को मिल गई थी. बाद में जीत जरूर उद्धव ठाकरे की हुई लेकिन दोनों ही रैलियों में आई बड़ी भीड़ ने दावों का दौर फिर शुरू कर दिया.