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अब समय आ गया है कि चुनाव आयोग ऐसे ज्योतिषियों व पत्रकारों पर रोक लगाए

Posted on: 28 Jan 2019 16:24 by Ravindra Singh Rana
अब समय आ गया है कि चुनाव आयोग ऐसे ज्योतिषियों व पत्रकारों पर रोक लगाए

यह देखना रोचक होगा कि इन वैज्ञानिकों के पूर्वानुमान अतीत में कितने सही रहे हैं।  88 में नष्ट हो जाती, तो युद्ध कौन करता। आज भी यह सवाल कोई नहीं पूछता, क्योंकि जनता की याददाश्त कमजोर होती है। जिस दिन भारतीय टीम अभ्यास मैच में हारी, उसी दिन एक ज्योतिषी ने कहा कि भारत को एक भी हार नहीं मिलेगी। भविष्यवाणियां अनुमानों की तरह ही छपती हैं। एक तथाकथित अर्थशास्त्री ने पिछले अक्टूबर में कहा था कि मार्च तक बैंक अपनी ब्याज दरें आधी कर देंगे। ज्यादातर जमाकर्ताओं ने इसके बाद अपना पैसा निकाल लिया। पर कुछ भी नहीं हुआ।

जनता को ठगने वाली भविष्यवाणियां करने चलन बढ़ रहा है। पहले वे यह काम स्वतंत्र रूप से करते थे। आजकल वे ठेके पर काम करते हैं, क्योंकि लोगों को अहसास हो गया है कि वे परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। अनेक राजनीतिक पार्टियां उनसे अपने लिए काम करवाती हैं और अपने लिए उपयुक्त भविष्यवाणियां कराती हैं।

कुछ ज्योतिषी विभिन्न स्थितियों के लिए भिन्न भविष्यवाणी करते हैं और बाद में एक सफल भविष्यवाणी की बदौलत लोकप्रिय हो जाते हैं। मुझे याद है कि एक ज्योतिषी ने एक उम्मीदवार के बारे में भविष्यवाणी की थी कि यदि वह जीत गया, तो उसकी मृत्यु हो जायेगी, जिसे जानकर उसने चुनाव ही नहीं लड़ा।

ज्योतिषी हमारे देश के लिए नये नहीं हैं। वे जानते हैं कि हमारे नागरिक भीरू हैं और वे इसका पूरा लाभ उठाते हैं। ज्योतिष बहुत सशक्त माध्यम है पर इसका इस्तेमाल गलत तरीके से किया जाता है। पिछले सप्ताह एक ज्योतिषी ने पाकिस्तान के खिलाफ मैचों की भविष्यवाणी की। उसके अनुसार, भारत के जीतने का अच्छा अवसर है पर यदि वह हार गया तो दोनों देशों के संबंध खराब हो जायंगे।

ऐसे अनेक ज्योतिषी हैं, जो सुरक्षित भविष्यवाणी करते हैं और लोगों को ठगते रहते हैं। अब समय आ गया है कि चुनाव आयोग ऐसे ज्योतिषियों व पत्रकारों पर रोक लगाए। मतदाता व भावनात्मक रूप से शोषण करके उन्हें ठगते हैं। ऐसा करना चुनाव प्रक्रिया में बाधा पहुंचाना है। मतदाता मतदान के लिए आजाद होना चाहिए। इसे भ्रमित करने की इजाजत किसी को नहीं होनी चाहिए।

चुनाव आयोग ने प्रचार व्यय पर सामग्री पर सख्त रुख अपनाया है। पर सर्वे करने वाली एजेंसियों पर ऐसी कोई सख्ती नहीं है। वे इस खामी का भरपूर लाभ उठाते हैं और सभी राजनीतिक पार्टियों से पैसा लेते हैं। वे न केवल उम्मीदवारों या पार्टियों का भाग्य बदलते हैं, बल्कि देश का भाग्य भी प्रभावित करते हैं।

यदि हम लोकतंत्र का और मजाक उड़ाना बंद करना चाहते हैं तो ऐसे सर्वेक्षणों पर तुरंत रोक लगनी चाहिए और यदि कोई मूल अधिकार की दुहाई देकर इस प्रतिबंध को अदालत में चुनौती दे, तो उसे भविष्यवाणी की पूरी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। यदि उसकी भविष्यवाणी 10 प्रतिशत भी गलत हो तो इसे एक सामाजिक अपराध समझकर दोषी को उपयुक्त दण्ड दिया जाना चाहिए।

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